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वाघा बॉर्डर पर ब्लास्ट

यह वह हमला था, जो घटित होने का इंतजार कर रहा था। वैसे, कम ही लोगों के जेहन में यह ख्याल रहा होगा कि वाघा बॉर्डर भी निशाने पर आ सकता है। वाघा बॉर्डर पर हर शाम क्लोजिंग सरेमनी को जोशीला अंजाम देने का मतलब कौम के प्रति वफादारी की सरगरमी को बरकरार रखना है। फौजी ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब के आगाज के बाद का यह सबसे बड़ा दहशतगर्दी हमला है। हकीकत यह भी है कि दहशतगर्द हिफाजती अमलों और सरकारी ठिकानों को हमले के लिए चुनते हैं। आम लोग उनके हमलों के शिकार ज्यादा होते हैं, क्योंकि वे घटनास्थल पर होते हैं। इतवार के फिदायीन हमले से यह आशंका पुरजोर हुई है कि जो इस तरह के जलसे में शिरकत करेंगे, उन्हें सुरक्षा-बलों का हिमायती समझकर निशाना बनाया जा सकता है। इस हमले में पचास से अधिक जानें गई हैं और अभी ध्यान इस तरफ रहना चाहिए कि जो जख्मी हैं, उन्हें बचाया जाए तथा मरने वालों के परिवारों की सही देख-रेख हो।

इस सवाल को फिर से उठाना होगा कि अगर मुल्क की हिफाजती व्यवस्था वही सब दिखाना चाहती है, जो वाघा हमले में दिखी, तो क्या इसका यह मतलब निकलता है कि मुल्क तरक्की कर रहा है? पाकिस्तान दहशतगर्दी के खतरों से बुरी तरह जकड़ा हुआ है। अगर घरेलू हिफाजत, अमन, स्थिरता, अर्थव्यवस्था व सामाजिक तरक्की के हालात सही रास्ते पर नहीं हैं, तो ये व्यवस्था की खामियां हैं। इस व्यवस्था में सिविलियन हुकूमत व फौजी अमला शामिल हैं। दुनिया की बेहतरीन नीतियों के साथ भी पाकिस्तान रातोंरात महफूज मुल्क नहीं बन सकता है। ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब को कुछ इलाकों में सभी दर्दों की दवा मान ली गई है, जबकि दहशतगर्द की मुखालफत करने वालों की मदद के बिना यह ऑपरेशन अधूरा है। जिस किसी ने भी पाकिस्तानियों के मारने के लिए एक फिदायीन को भेजा था (जुनदुल्ला और जमातुल अहरार के अलग-अलग दावों की जांच के बिना अभी कुछ कहना मुश्किल है), उस सच को जानने से बड़ी हकीकत यह है कि पाकिस्तानियों को मारने के लिए पाकिस्तान के पास कई सारी दहशतगर्द जमातें हैं और उनके पास आतंक को अंजाम देने के ढेर सारे तरीके भी हैं।   
डॉन, पाकिस्तान

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