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न्यायप्रिय ग्रह हैं शनि देव

शनि के शत्रु राशि वृश्चिक में प्रवेश का क्या प्रभाव होगा?
-शौर्य, भभुआ


शनि की साढ़े साती को संस्कृत में बृहत कल्याणी और उनकी ढैया को घु कल्याणी कहते हैं। शनि गोचर फल में केव तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में ही शुभ फल प्रदान करते हैं। जिन लोगों की जन्मराशि तुला, वृश्चिक और धनु हैं, वे शनि की साढ़े साती के प्रभाव में हैं। इनके साथ ही मेष और सिंह राशि वालों पर 2 नवंबर की देर शाम 8.54 बजे से शनि के अपनी उच्च राशि तुला को छोड़ शत्रु मंगल की राशि वृश्चिक में जाने से शनि की ढैया शुरू हो गई है। साथ ही कन्या राशि वाले साढ़े साती और कर्क व मीन राशि वाले शनि की ढैया से मुक्त हो गए हैं। जिन लोगों का शनि जन्मकुंडली में अपनी नीच राशि मेष में है, उन्हें थोड़ी परेशानी हो सकती है। लेकिन डरें नहीं, शनि न्यायप्रिय ग्रह हैं। पिप्पलाद मुनि की भविष्यपुराण में जो कथा है, वह भी शनि के प्रभाव को बताती है। शनि से पीड़ित लोग पिप्पलाद मुनि की कथा का नियमित पाठ करें तो उन्हें शनि शुभ फल प्रदान करेंगे। इन दिनों जो लोग हनुमान चालीसा का लगातार 7 बार पाठ करेंगे, वह भी शनि के खराब प्रभावों से पीड़ित नहीं होंगे। शुक्र, बुध, राहु इनके परम मित्र हैं।
विभिन्न भावों पर शनि का प्रभाव चंद्र राशि के अनुसार:
प्रथम भाव- शनि के यहां होने से बीमारी आदि से परेशानी। धन का नाश।
द्वितीय भाव- संतान को कष्ट। रोजगार में बाधा। परिवार में कलह।
तृतीय भाव- शुभ फल मिलता है।
चौथा भाव- धन की कमी। रिश्तेदारों और भाइयों से कष्ट। वाहन दुर्घटना।
पांचवां भाव- बुद्धि भ्रम से धन की हानि। संतान से कष्ट। अनजाना भय।
छठा भाव- शुभ फल मिलेगा। सुख में वृद्धि। विघ्न बाधा समाप्त।
सातवां भाव- जीवनसाथी से कष्ट।
आठवां भाव- अशुभ फल मिते हैं।
नवम भाव- धन की कमी से कार्यों में बाधा। पितातुल्य आदमी की मौत।
दसवां भाव- बीमारी आदि की आशंका रहेगी। व्यापार में असफलता।
ग्याहरवां भाव- शुभ फल मिते हैं। प्रतिष्ठा में वृद्धि। सभी प्रकार के सुख।
बारहवां भाव- कामकाज में विघ्न-बाधा। शत्रुओं द्वारा धन हानि और भय।

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