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जागरूक हुई हैं, तो बदलाव भी लाएंगी

महिलाओं की राजनीतिक समझ और अपने अधिकारों के प्रति उनकी जागरुकता को लेकर अक्सर सवाल खडे किए जाते हैं। लेकिन, जिस तरह महिलाएं राजनीतिक, सामाजिक बदलाव लाने में अहम भागीदारी निभा रही हैं, वह यह साबित करने के लिए काफी है कि स्थितियां अब काफी बदल चुकी हैं।

महिलाओं को भी धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी है कि वे राजनीतिक निकायों में आएंगी, तभी उनके लिए बदलाव व तरक्की की स्थितियां तैयार होंगी। अब अमूमन कोई महिला अपने पति या ससुर की देखादेखी किसी खास नेता या पार्टी को वोट नहीं देती। उसे अपनी पसंद और जरूरत मालूम है। यह अच्छा बदलाव है। शहरी महिलाओं के मुकाबले ग्रामीण महिलाएं मतदान के प्रति अधिक जागरूक हैं। शहरी महिलाएं जागरूक होते हुए भी लापरवाह हैं। जबकि, ग्रामीण महिलाओं के लिए मतदान में भागीदारी किसी उत्सव में हिस्सा लेने जैसा है। शिक्षित समाज को अपना यह आलस्य छोडम्ना होगा। इतने वर्षो में लडम्कियों को शिक्षा देते हुए मैंने यह गौर किया कि पिछले चार-पांच वर्षो में उनमें राजनीतिक जागरुकता आई है। वे ‘पॉलिटिक्स’ (राजनीति) भले न समङों, लेकिन ‘पॉलिटी’ (शासन) समझने लगी हैं। उन्हें स्थायी व गठबंधन की सरकार के मायने समझ में आने लगे हैं। वे राजनीति से दूर हैं, लेकिन शासन चाहती हैं। जिसमें महिलाओं के लिए सुरक्षा व सम्मान का वातावरण हो। पिछले एक-डेढ दशक में महिलाओं की स्थिति में काफी फर्क आया है। रोजगार, शिक्षा व विभिन्न क्षेत्रों में उनकी संख्या बढम्ी है।

लेकिन महिला सुरक्षा व उनपर बढम्ता अपराध मौजूदा वक्त में एक बडम मसला है। समतामूलक समाज के लिए सुरक्षा भी तो सुनिश्चित करनी होगी। महिलाएं एक ऐसी सरकार चुनने में अपनी भागीदारी दें, जो महिला सुरक्षा व सम्मान को सवरेपरि समङो। यह सुरक्षा व सम्मान वे हासिल कर लेंगी तो समानता, अवसर और स्वावलंबन के रास्ते भी निकलते चले जाएंगे। राजनीति पार्टियां भी महिला जनप्रतिनिधियों को टिकट देने में खानापूर्ति न करें।

राजनीति में महिलाओं की स्थिति ‘रिक्त स्थान भरने जैसी है।’ वही महिलाएं आगे बढमई गईं, जिनके परिवार के पुरुष संकट में थे। आम महिलाओं, जमीन से जुडी महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश का रास्ता सुगम होना चाहिए। उन्हें सिर्फ पंचायत और नगर निगम तक समेटकर रखने की बजाय विधानसभा और लोकसभा में भी बराबर का हक मिलना चाहिए। (जैसा श्रेयसी मिश्रा को बताया)

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