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कम से कम उम्मीद तो जगाएं राजनेता

प्रदेश फिर चुनाव की तरफ है। वैसे तो चुनाव एक सरकार बनाने के लिए होता है लेकिन ये हम हैं और हमारा राज्य, कि एक ही चुनाव में तीन सरकारें और दो बार राष्ट्रपति शासन। इसके बाद भी टूटते-बनते गठजोड़। राज्य की इस हालत पर जिस किसी से बात करो वह दुखी नजर आता है। जो राजनीति में है वह भी और जो इससे दूर का रिश्ता रखता है, वह भी। हां, इतना फर्क जरूर नजर आता है कि अब लोग बदलाव की बात करने लगे हैं और बेहतर राज्यों से तुलना भी। खासकर उन राज्यों से जो झारखंड के साथ ही बनाए गए थे।

हम छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड की बात कर रहे हैं। जिस समय ये राज्य बने थे तब की हालत को याद करें तो खनिज और कोयला खानों की वजह से माना जा रहा था कि अब झारखंड के दिन बदल जाएंगे क्योंकि यहां की आमदनी से ही बिहार का काम चलता है। बिहार भी तब निराश कम नहीं था लेकिन आज हालत ये है कि राज्य के कई बड़े नेता निजी बातों में तो हमेशा और कई बार सभाओं में भी कहते हैं कि इससे तो बेहतर बिहार ही था। यानी राज्य न ही बनता तो बेहतर होता।

इन बातों के मर्म में जाएं तो लगेगा कि राज्य अपने बनने से नहीं, इसके बाद यहां की राजनीति के नाम पर चले खेल और हुकूमत में आए लोगों की वजह से स्थापना से भी पीछे चला गया। कई हजार करोड़ के घोटाले और अनियमितताओं के मामले में भले देश में झारखंड ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हों लेकिन तरक्की के हर पैमाने में हमारी गति मंथर ही कहें तो बेहतर होगा। हमारे मेडिकल कालेज बढ़ने के बजाए वर्तमान सीटों के लिए काफी नहीं माने गए। हमारे राज्य में आए उच्च शिक्षा के संस्थान अपने लिए जगह पाने में ही सालों पीछे रह गए। बात चाहे आईआईएम की हो या फिर सेंट्रल
यूनिवर्सिटी की, हमारे राज्य में मैट्रो या मोनो रेल की कल्पना तो दूर, बस सेवा भी शुरू नहीं हो सकी। राज्य का न अपना परिवहन निगम है और न ऐसा कोई बस स्टैंड, जिसे किसी राज्य के सामने नजीर कहा जा सके।

स्कूलों के मामले में भी यही स्थिति। मॉडल स्कूलों की हालत देखें तो लग जाएगा कि आम स्कूलों की हालत कैसी होगी। कई महीने देर से किताबें मिलती हैं। यूनिफार्म और साइकिलों के बारे में तो कहना ही क्या। एक सरकार कहती है लैपटाप देंगे दूसरी इस बारे में सोचती ही नहीं।

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