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दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाईं महिला जनप्रतिनिधि

विधासभा चुनाव की घोषणा के बाद तमाम राजनीतिक पार्टियों की महिला मोर्चा में 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग उठ रही है। पार्टियां यह कहकर अपना बचाव कर रही हैं कि जिनमें जीतने की क्षमता होगी, उन्हें ही टिकट दिया जाएगा। छात्रसंघ चुनाव हो या लोकसभा व विधानसभा चुनाव, राज्य में महिलाओं का प्रतिनिधित्व खानापूर्ति भर रहा है।

लोकसभा के 14 सीटों के लिए टिकट से वंचित रहीं महिला नेत्रियां इस भरोसे में थीं कि विधानसभा की 81 सीटों पर उनके लिए बेहतर स्थितियां बनेंगी। लेकिन, इस बार भी उन्हें माकूल तवज्जो दी जाएगी, इसे लेकर वे संशय में हैं। राज्य में अब तक हुए दो विधानसभा चुनावों में महिला प्रतिनिधित्व दहाई आंकड़ा भी पार नहीं कर पाया। 2005 में पांच नेत्रियों ने जीत हासिल की थी। जबकि, 2009 में आठ महिला विधायक चुनी गईं।

राजनीति की कठिन डगर: 2005 के विधानसभा चुनाव में 94 नेत्रियों ने चुनाव लड़ा। इनमें सिर्फ पांच को जीत हासिल हुई। जीतनेवालों में अन्नापूर्णा देवी (राजद), जोबा मांझी (यूजीडीपी), अपर्णा सेनगुप्ता (फॉरवर्ड ब्लॉक), सुशीला हांसदा (जेएमएम) और कुंती देवी (भाजपा) शामिल थीं। शेष अपना जमानत भी नहीं बचा पाईं। 2009 में 107 नेत्रियां चुनावी मैदान में आईं, लेकिन सफलता सिर्फ 8 के हिस्से आई, शेष की जमानत जब्त हो गई। सफल नेत्रियों में- अन्नपूर्णा देवी (राजद), मेनका सरदार, विमला प्रधान, कुंती देवी (तीनों भाजपा), गीताश्री उरांव (कांग्रेस), गीता कोडम (जय भारत समानता पार्टी) व सीता सोरेन (झामुमो) शामिल हैं। सफल नेत्रियों में भी भाजपा सरकार ने सिर्फ विमला प्रधान को मंत्री पद दिया। जबकि, हेमंत सोरेन (कांग्रेस-झामुमो गठबंधन) सरकार में अन्नपूर्णा देवी व गीताश्री उरांव मंत्री बनाई गईं।

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