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भारत में भी खतरा, इबोला के खोजकर्ता ने किया आगाह

भारत में भी खतरा, इबोला के खोजकर्ता ने किया आगाह

अफ्रीकी देशों में फैले और आज दुनियाभर में चिंता का विषय बन चुके खतरनाक वायरल रोग इबोला को खोजने वाले ने आगाह किया है कि यह वायरस अपने संक्रमण की चपेट में भारत समेत किसी भी देश को ले सकता है।

प्रोफेसर पीटर पिओट ने आशंका व्यक्त की है कि अमेरिका और यूरोप में इसके कुछ मामलों को देखते हुए भारत जैसे विकासशील और सघन जनसंख्या वाले देश खासतौर से हाई रिस्क जोन में हैं। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल सघन जनसंख्या वाले देशों के अनेक इलाकों में सफाई और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था नहीं है।

ऐसे देशों में किसी भी संदिग्ध मरीज को संक्रमण फैलने से रोकने के लिए अलग-थलग रखना एक बेहद चुनौती भरा काम होगा। भारत को सतर्क रहने की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत के कामगार बड़े पैमाने पर पश्चिम अफ्रीकी देशों में वहां के व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत को ऐसे किसी भी संभावित इबोला संक्रमण से निपटने की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने सभी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को चाकचौबंद करना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों को इस दिशा में आवश्यक और समुचित ट्रेनिंग भी प्रदान की जानी चाहिए।

इबोला को खाजने वाले वैज्ञानिकों की टीम में शामिल चिकित्सक एवं शोधकर्ता पीटर पिओट ने अपने संस्मरण ‘नो टाइम टू लूज - ए लाइफ इन परस्यूट ऑफ डेडली वायरस’ में लिखा है कि वैज्ञानिकों की टीम ने बीमारी की जड़ अर्थात वायरस का पता लगाया, तो वे उससे होने वाली बीमारी और उसके दुष्परिणामों से सकते में आ गए थे।

वैज्ञानिकों के दल ने जब मरीजों के खून के नमूनों की जांच की, तो उन्हें तार की तरह लंबे कीड़े जैसा दिखने वाला वायरस पाया। वायरस का पता लगाने के बाद जब वैज्ञानिकों का दल जाएरे पहुंचा, तो यह देखकर हैरान रह गया कि वायरस न सिर्फ तेजी से फैल रहा है, बल्कि उतनी ही तेजी से मरीजों की जान ले लेता है। 

सिप्ला ने की मुफ्त दवा देने की पेशकश
इस बीच लाबेरिया और सियेरा लियोन में इबोला के मरीजों पर एंटी-एड्स दवाओं के प्रयोग से डॉक्टरों को मिली सफलता से उत्साहित होकर इस दवा को बनाने वाली कंपनी सिप्ला के चेयरमैन वाई के हमीद ने इन दवाओं को भारत समेत दुनिया के किसी भी प्रभावित क्षेत्र में भेजने की पेशकश की है। शुरू में दवाओं की मुफ्त आपूर्ति की जाएगी। सिपला एंटी-एड्स दवाओं के रूप में लैमीवुडाइन, टैनोफोविर, एंटेकावीर और ऐडफोवीर जैसी दवाएं बनाती है। इन दवाओं का एंटी-एड्स के अलावा हेपेटाइटिस-सी जैसे वाइरल बीमारियों में उपयोग किया जाता है।

हमीद ने कहा कि उन्हें धीरे-धीरे इस बात का यकीन होता जा रहा है कि वायरल रोग होने के कारण इबोला एचआईवी का ही एक प्रकार हो सकता है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि अफ्रीका में डॉक्टरों को इबोला मरीजों पर एड्स की इन दवाओं के प्रयोग से उत्साहवर्धक नतीजे मिले हैं। उन्होंने कहा कि जब तक इबोला की कारगर और अचूक दवा की खोज होती है, तब तक इन दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है। हमीद ने कहा कि पिछले सप्ताह उन्होनें डब्ल्यूएचओ को चिट्ठी लिखकर यह पता लगाने की गुजारिश की है कि अबतक इबोला से संक्रमित दस हजार मरीजों में से कितने एचआईवी पॉजिटिव हैं। 

इबोला आज दुनियाभर में चिंता का विषय बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सहित दुनिया भर की चिकित्सा संस्थाएं और एजेंसियां पश्चिमी अफ्रीकी देशों में महामारी के रूप में फैले इबोला वायरस को विश्व के लिए बड़े खतरे के रूप में देख रही हैं।  

बिल गेटस 50 करोड़ डॉलर दान करेंगे
माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने कहा है कि पश्चिमी अफ्रीका में इबोला से 4,900 लोग मारे जा चुके हैं। यह विश्व स्वास्थ्य के इतिहास में सबसे मुश्किल दौर है। इस बीमारी को विश्व में फैलने से रोकने के लिए गंभीर प्रयास किए जाने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मलेरिया और डेंगू से लड़ने की जरूरत पर भी जोर दिया। गेट्स ने घोषणा की है कि वह विश्व के विकासशील देशों में मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों से लड़ने के लिए 50 करोड़ डॉलर प्रदान करेंगे। उन्होंने कहा कि इबोला का फैलना एक चेतावनी की तरह है। एक बयान में बताया गया कि न्यू ऑर्लियंस में रविवार को अमेरिकन सोसायटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसन एंड हाईजीन की 63वीं बैठक में गेट्स ने कहा कि उनका गेट्स फांउडेशन मलेरिया, निमोनिया, डायरिया और अन्य बीमारियों में कमी लाने के लिए 2014 में 50 करोड़ डॉलर प्रदान कर रहा है।

कैसे पड़ा नाम इबोला
करीब चार दशक पहले कांगो गणराज्य के एक गांव में पहली बार एक बीमारी सामने आई। वर्ष 1967 में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम को इस रहस्यमय बीमारी की जांच का जिम्मा दिया गया। इसी टीम ने एक नदी पर इसका नाम रखा।

इस टीम के सदस्य पिओट के अनुसार, एक रात सभी वैज्ञानिक इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि इस वायरस को क्या नाम दिया जाना चाहिए। टीम के एक फ्रांसीसी सदस्य ने सुझाव रखा कि वायरस का नाम यांबूकू गांव के नाम पर रखा जा सकता है, जहां सबसे पहले यह वायरस फैला। लेकिन टीम के अन्य सदस्य का तर्क था कि ऐसा करने से गांव को हमेशा के लिए अशुभ मान लिए जाने का खतरा है।

एक अन्य वैज्ञानिक कार्ल जॉनसन ने फिर इस वायरस का नाम किसी नदी के नाम पर रखने का सुझाव रखा जिसे सर्वसम्मति से मान लिया गया। पहले वायरस का नाम कांगो नदी के नाम पर रखने का विचार आया। यह नदी पूरे कांगो गणराज्य और जगलों से होकर गुजरती है। लेकिन कांगो पर एक अन्य वायरस का नाम ‘क्रिमियन कांगो हेमोरहैगिक फीवर वायरस’ पहले ही रखा जा चुका था।

वैज्ञानिकों ने इसके बाद क्षेत्र के नक्शे में पाया कि यांबुकु गांव के पास से इबोला नाम की एक नदी बहती है जिसका अर्थ स्थानीय भाषा में ‘काली नदी’ है। पिओट ने खुलासा किया कि बाद में देखा गया कि नक्शा पूरी तरह सही नहीं था और यांबुकु के सबसे पास से गुजरने वाली नदी इबोला नहीं थी। लेकिन फिर भी टीम को नाम सही लगा और सर्वसम्मति से इस जानलेवा वायरस का नाम इबोला वायरस रख दिया गया।

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