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जमात-ए-इस्लामी नेता की मौत की सजा बरकरार

जमात-ए-इस्लामी नेता की मौत की सजा बरकरार

पाकिस्तान के खिलाफ 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जन संहार और मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में जमात-ए-इस्लामी के एक चरमपंथी नेता को सुनाई गई मौत की सजा को बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने आज बरकरार रखा।

जस्टिस एस के सिन्हा की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय अपीलीय पीठ ने 62 वर्षीय मुहम्मद कमरूज्जमां की अपील पर यह फैसला सुनाया। याचिका में उसने खुद को पिछले साल मई में मौत की सजा सुनाए जाने के एक विशेष न्यायाधिकरण के आदेश को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जमात प्रमुख मतीउर रहमान निजामी और पार्टी के शीर्ष नेता मीर कासिम अली को मौत की सजा सुनाए जाने के एक हफ्ते के भीतर आया है। इन लोगों को भी 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान लोगों पर अत्याचार करने के मामले में मौत की सजा सुनाई गई है। सोहागपुर गांव में 25 जुलाई 1971 को 164 निहत्थे लोगों की सामूहिक हत्या में मदद करने के मामले में विशेष बांग्लादेशी न्यायाधिकरण ने कमरूज्जमां को मौत की सजा सुनाई थी।

 जमात का सहायक महासचिव कमरूज्जमां युद्ध अपराध का तीसरा दोषी है, जिसकी अपील का निपटारा सुप्रीम कोर्ट में किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले युद्ध अपराध के मामलों में से एक में न्यायाधिकरण द्वारा दी गई मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था जबकि दूसरे मामले में एक अन्य दोषी की मौत की सजा को बरकरार रखा था। फैसले के तुरंत बाद अभियोजन पक्ष के वकीलों ने कहा कि कमरूज्जमां के पास अब कानून के तहत केवल राष्ट्रपति से क्षमा याचना करने का विकल्प है। उसके पास फैसले की समीक्षा के लिए अन्य कोई कानूनी विकल्प नहीं है।

हालांकि, बचाव पक्ष के वकीलों ने कहा कि उनके मुवक्किल के पास खुद शीर्ष अदालत द्वारा ही फैसले की समीक्षा किए जाने का विकल्प है क्योंकि यह उसका संवैधानिक अधिकार है। कमरूज्जमां अब निष्क्रिय हो चुके इस्लामी छात्र संघ का नेता था। यह उस समय जमात का छात्र मोर्चा था, जो पाकिस्तान से बांग्लादेश की स्वतंत्रता के खिलाफ था।

बांग्लादेश में युद्ध अपराध मुकदमों के लिए प्रधानमंत्री शेख हसीना की लोकतांत्रिक सरकार द्वारा गठित किए गए दो विशेष न्यायाधिकरणों ने नौ लोगों को मौत की सजा और दो अन्य को आमरण उम्रकैद की सजा सुनाई है। अब तक इनमें से केवल एक, जमात के संयुक्त महासचिव अब्दुल कादिर मुल्ला को फांसी दी गई है, जबकि दो दोषी अमेरिका और ब्रिटेन में रह रहे हैं और कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा के लिए लंबित हैं।

पाकिस्तानी सेना और उसके समर्थकों ने मुक्ति संग्राम के दौरान तकरीबन 30 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। जमात पाकिस्तानी सैन्य शासक के साथ थी और बांग्लादेश की स्वतंत्रता के खिलाफ थी।

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