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आसानी से हंसा और रुला देने वाले अभिनेता थे सदाशिव अमरापुरकर

आसानी से हंसा और रुला देने वाले अभिनेता थे सदाशिव अमरापुरकर

बॉलीवुड अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर का 64 साल की उम्र में आज निधन हो गया। वह फेफड़ों के संक्रमण से पीड़ित थे और उनका कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्तपाल में इलाज चल रहा था। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार कल अहमदनगर जिले में उनके पैतृक स्थल में किया जाएगा।

अमरापुरकर को दो बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। 1984 में उन्हें 'अर्धसत्य' में सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार की भूमिका के लिए पुरस्कार से नवाजा गया, जबकि 1991 में उन्हें 'सड़क' फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला था। उन्होंने आंखें इश्क, कुली नंबर 1 और गुप्त : द हिडन ट्रुथ सहित कई फिल्मों में काम किया था। बाद में उन्होंने अपना ध्यान मराठी फिल्मों पर केंद्रित कर दिया था। अमरापुरकर 2012 में आई 'बांबे टॉकीज' फिल्म में अंतिम बार दिखे थे। वह पिछले कुछ सालों से सिर्फ चुनिंदा फिल्में ही कर रहे थे और सामाजिक कार्यों में ज्यादा रूचि ले रहे थे।

बेमिसाल अभिनेता

अपनी खास शैली के लिए पहचाने जाने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी सदाशिव अमरापुरकर ने अपने तीन दशकों से भी लंबे करियर में चाहे खलनायक की भूमिका की हो या कोई हास्य भूमिका, दोनों में ही वे अपने अभिनय के जादू से भारतीय सिनेमा के दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब रहे। अमरापुरकर का निधन आज सुबह एक अस्पताल में हो गया। पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे अमरापुरकर की उम्र 64 साल थी।

अमरापुरकर ने फिल्म सड़क में एक निर्मम किन्नर की एक यादगार भूमिका निभाई थी। अर्धसत्य में खलनायक और इश्क में एक स्वार्थी पिता की भूमिका को भी उन्होंने सहजता के साथ बड़े पर्दे पर जीवंत कर दिया था। पर्दे पर अपने नकारात्मक किरदारों के जरिए लोगों में खौफ पैदा करने वाला यह अभिनेता असल जिंदगी में एक बेहद सज्जन किस्म का इंसान रहा, जिसका जुड़ाव विभिन्न सामाजिक गतिविधियों से बना रहा।

वर्ष 1956 में नासिक के एक ऑटोचालक के घर जन्मे अमरापुरकर का असली नाम गणेश कुमार नारवोडे था। उन्होंने वर्ष 1974 में अपना नाम सदाशिव रख लिया था। अपने परिवार और मित्रों के बीच तात्या के नाम से मशहूर अमरापुरकर का लालन-पालन अहमदनगर में हुआ। यहां वे अपने माता-पिता और छोटे भाई के साथ रहते थे। छोटी उम्र से ही अमरापुरकर को अभिनय का शौक रहा और वे अपने स्कूल-कॉलेज में विभिन्न नाटकों में हिस्सा लेते रहे।

अमरापुरकर एक प्रशिक्षित गायक भी थे लेकिन उन्हें बताया गया था कि मध्यम सुर के गायन के कारण वे इस क्षेत्र में ज्यादा प्रसिद्धि हासिल नहीं कर पाएंगे। इसलिए 21 साल की उम्र में सदाशिव ने थियेटर और मंच का रुख कर लिया। उन्होंने 50 से ज्यादा नाटकों में अभिनय किया और वर्ष 1979 तक वह मराठी सिनेमा में भी छोटी-मोटी भूमिकाएं निभाते रहे।

1981-82 में उन्होंने मराठी नाटक हैंडस अप में नाटय अभिनेता अविनाश मसूरेकर और भक्ति बारवे इनामदार के साथ काम किया। यह नाटक सुपरहिट रहा और अमरापुरकर फिल्म निर्देशक गोविंद निहलानी की नजरों में आ गए। निहलानी उस समय अपनी फिल्म अर्धसत्य में प्रमुख खलनायक की भूमिका निभा सकने वाले कलाकार की तलाश में थे। फिल्म सफल रही और अमरापुरकर के अभिनय को काफी सराहना मिली। संवाद बोलने का उनका अंदाज उस दौर में हिंदी फिल्मों के खलनायकों से काफी जुदा था। अर्धसत्य के बाद अमरापुरकर ने पुराना मंदिर, नासूर, मुद्दत, वीरू दादा, जवानी और फरिश्ते जैसी फिल्मों में छोटे किरदार निभाए।

वर्ष 1987 में अमरापुरकर ने धर्मेंद्र अभिनीत फिल्म हुकूमत में मुख्य खलनायक की भूमिका में आए। यह फिल्म एक ब्लॉकबस्टर रही, जिसने मिस्टर इंडिया से भी ज्यादा कमाई की। अमरापुरकर धर्मेंद्र के लिए काफी शुभ साबित हुए और उसके बाद से ये दोनों कई फिल्मों में एकसाथ नजर आए। वर्ष 1991 में आई फिल्म सड़क में इन्होंने एक किन्नर के किरदार को इतनी जीवंतता से निभाया कि इसके लिए इन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही वह सर्वश्रेष्ठ नकारात्मक भूमिका के लिए सम्मान पाने वाले पहले अभिनेता बन गए थे।

1990 के दशक में उन्होंने मोहरा, इश्क, हम साथ साथ हैं, आंखें, कुली नंबर 1, जय हिंद और मास्टर जैसी फिल्मों में कई सहायक और हास्य भूमिकाएं निभाईं। वर्ष 1996 में उन्होंने छोटे सरकार में डॉक्टर खन्ना की भूमिका निभाई। वर्ष 2000 के बाद से वे बमुश्किल ही हिंदी फिल्मों में नजर आए। हिंदी में 300 से ज्यादा दमदार भूमिकाएं निभाने वाले अमरापुरकर ने बंगाली, उडिया और हरियाणवी फिल्मों में भी अपना हाथ आजमाया।

पिछले कुछ समय से अमरापुरकर फिल्म उद्योग से दूर ही रहे। आखिरी बार वह 2012 में फिल्म बॉम्बे टॉकीज में बड़े पर्दे पर नजर आए थे। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष का जश्न मनाने के लिए बनाई गई थी। खलनायकों को नायकों के समकक्ष ला खड़ा करने के लिए अमरापुरकर को हमेशा याद किया जाएगा।

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