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क्या तमिलनाडु में कमल खिलेगा?

महाराष्ट्र का सियासी किला फतह करके भाजपा विजयी भाव लिए विंध्य क्षेत्र को पार कर गई है। तो क्या अब तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होने का उसके लिए वाकई एक बेहतर मौका है? तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव में अभी 18 महीने हैं। इस अवधि में मुमकिन है कि राजनीतिक परिस्थिति पूरी तरह से बदल जाए, मगर सियासी पंडितों की कयासबाजी शुरू हो चुकी है।

पिछले सप्ताह एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत एमडीएमके नेता वाइको ने द्रमुक सुप्रीमो एम करुणानिधि के छोटे बेटे एम के स्टालिन से मुलाकात की। ये दोनों नेता करीब आठ वर्षों के बाद एक-दूसरे से मिले, हालांकि इस मुलाकात को महज ‘राजनीतिक शिष्टाचार’ बताया गया। लेकिन इस मुलाकात ने कुछ यों संदेश दिया कि दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। इस भेंट की भूमिका एक टेलीविजन इंटरव्यू के दौरान लिखी गई, जिसमें स्टालिन ने वाइको की न सिर्फ तारीफ की, बल्कि यह भी कहा कि वह उनसे मिलना चाहेंगे। यह मुलाकात पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबुमणि रामदौस की बेटी की शादी के जलसे में हुई, जिसमें वाइको और स्टालिन, दोनों आमंत्रित थे। मैरिज हॉल में स्टालिन पहल करते हुए वाइको के पास चलकर गए और फिर दोनों नेताओं ने एक-दूसरे का बेहद गर्मजोशी से अभिावदन किया तथा साथ-साथ तस्वीरें भी खिंचवाईं। इसके अगले दिन करुणानिधि ने रामदौस की बेटी और दामाद को आशीर्वाद देते हुए रामदौस को मित्र कहा और स्टालिन-वाइको मुलाकात की तारीफ करते हुए उसे एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। करुणानिधि ने 2016 के विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत गठबंधन तैयार करने की स्टालिन की कोशिशों की भी सराहना की और खुद भी वाइको से मिलने की इच्छा जाहिर की। वाइको के बारे में करुणानिधि के शब्द थे- ‘वह मित्र हैं, दुश्मन नहीं।’

जाहिर है, समय का पहिया पूरा घूम गया है। बीस साल पहले द्रमुक से निकाले जाने के बाद वाइको ने अपनी अलग पार्टी बनाई थी। उस वक्त वह एक तेजतर्रार नेता हुआ करते थे, जिसे तमिल नौजवानों की भरपूर हिमायत हासिल थी। उनका कद अचानक तेजी से बढ़ गया था और श्रीलंका के मुद्दे को उठाने के कारण उन्हें तमिल राष्ट्रवाद के सबसे प्रखर प्रवक्ता के तौर पर देखा जाने लगा था। वाइको तब स्टालिन और डीएमके के दूसरे बड़े नेताओं की बराबरी करने लगे थे। चूंकि खून पानी से अधिक गाढ़ा होता है, इसलिए वाइको को द्रमुक से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।

अब हालात ने पुराने विरोधियों को फिर साथ आने के लिए विवश किया है। वाइको का अन्नाद्रमुक से मोहभंग हो चुका है, क्योंकि अम्मा का रवैया बेहद कठोर था और 2011 के विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे के मसले पर उन्होंने वाइको की पार्टी के प्रति ऐसा रुख अपनाया कि वह हाशिये पर चली गई। अंतत: सीटों का बंटवारा न हो सका और आहत वाइको ने उस चुनाव के बहिष्कार का फैसला कर लिया। इस निर्णय से उनका आधार कमजोर ही पड़ा। भाजपा के साथ कुछ समय तक के उनके गठजोड़ से भी उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। दूसरी तरफ, करुणानिधि भी अपनी पार्टी द्रमुक को पुनर्जीवित करने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली है। यह सही है कि कागजों में पार्टी के पास 23 प्रतिशत वोट दिखता है, लेकिन हकीकत में अपने पूरे इतिहास में वह इतनी कमजोर पहले कभी नहीं दिखी। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, वंशवाद और पारिवारिक कलह के कारण पार्टी पर करुणानिधि की पकड़ ढीली पड़ती गई।

तमिलनाडु में रामदौस और वाइको की पार्टी भाजपा के नेतृत्व वाले गठजोड़ का हिस्सा हैं। अभिनेता विजयकांत की पार्टी और कुछ अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर इन दोनों पार्टियों ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था। लेकिन पीएमके और डीएमडीके, दोनों ही भाजपा को लेकर चिंतित हैं। रामदौस इसलिए नाखुश हैं, क्योंकि उनके बेटे अंबुमणि को मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई। फिर महाराष्ट्र में पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना के साथ भाजपा ने जैसा व्यवहार किया, उससे भी क्षेत्रीय नेता सतर्क हो गए हैं। संभवत: मोदी लहर की निरंतरता को देखते हुए तमिलनाडु के क्षेत्रीय नेता एकजुट होने लगे हैं। पीएमके और एमडीएमके द्रमुक की तरफ खिंचती दिख रही है, मगर विजयकांत की पार्टी अभी खामोश है। कुछ भाजपा नेता मानते हैं कि विजयकांत उनके साथ बने रहेंगे, मगर वे इस बात का कोई जवाब नहीं देते, जब उनसे यह पूछा जाता है कि क्या विजयकांत को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करके वे विधानसभा चुनाव लड़ेंगे? विजयकांत की पार्टी की यह पुरानी साध है।
दोनों बड़ी द्रविड़ पार्टियां भ्रष्टाचार के भंवर में फंसी हैं। पिछले ही सप्ताह ए राजा, कनिमोई और दयालु अम्माल के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई है। ऐसे में, अदालत द्वारा जयललिता को दोषी ठहराए जाने पर करुणानिधि कुछ भी नहीं बोल पा रहे। जयललिता का भविष्य सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर है। उधर तमिलनाडु में कांग्रेस की हालत बेहद दयनीय बनी हुई है। इसके प्रदेश अध्यक्ष इस्तीफा दे चुके हैं। उनका आरोप था कि उनके द्वारा बुलाई गई बैठक में पार्टी पदाधिकारी भी शरीक नहीं होते थे। उनका इशारा था कि ऐसा वे अपने केंद्रीय आकाओं के कहने पर कर रहे थे। 

ये तमाम परिस्थितियां तमिलनाडु की राजनीति में भाजपा को अपना प्रभाव कायम करने का शानदार मौका मुहैया करा रही हैं। पार्टी का इस राज्य में कोई काडर नहीं है। लेकिन भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र में यह साबित किया है कि ‘मोदी लहर’ के रहते उसे इसकी आवश्यकता भी नहीं है। लेकिन तमिलनाडु में खेल कुछ अलग हो सकता है। चूंकि चुनाव अभी 18 महीने दूर हैं, ऐसे में सवाल यह है कि क्या तब तक मोदी लहर कायम रहेगी? देश के अन्य हिस्सों की तरह तमिल आबादी की भी आकांक्षाएं हैं। देश के अन्य हिस्सों के वोटरों की तरह उनके भीतर भी बेहतर जिंदगी की लालसा पलती है। तो क्या इसका अर्थ यह है कि वे द्रविड़ पार्टियों से नाता तोड़ लेंगे?

इन सवालों के जवाब इस बात पर निर्भर करेंगे कि भाजपा आने वाले दिनों में तमिल राष्ट्रवाद और मछुआरों के मसले पर किस तरह का रुख अपनाती है। पांच तमिल मछुआरों को मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में फांसी देने के श्रीलंकाई कोर्ट के फैसले के साथ ही यह मुद्दा उबल उठा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने श्रीलंका के सामने यह मुद्दा उठाया है। लेकिन क्या वह उन्हें फांसी से बचाकर सकुशल भारत ला पाएगा? भाजपा के सहयोगियों के लिए यह एक अहम मसला है। हालांकि भाजपा के राज्य नेतृत्व ने तमिल राष्ट्रवाद के पक्ष में बढ़-चढ़कर नारे लगाए हैं, लेकिन केंद्र सरकार की विदेश नीति पिछली यूपीए सरकार जैसी ही दिख रही है। क्या मोदी और शाह इन तमाम चुनौतियों पर पार पा सकेंगे? इसका जवाब वक्त के पाले में है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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