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धमाकों के उत्सव की अगली सुबह

सुबह वातावरण में युद्ध के बाद का सन्नाटा है। नहीं तो रात पूरे शहर में जैसे बमबारी हो रही थी। बुजुर्ग बिस्तरों के बंकर में घुस अपनी सांसों की सलामती की दुआ मांग रहे थे। पंछी पिंजरे में छिपे थे, कुत्ते दुम दबाए कूडे़ में। अभी तक अस्पतालों में तीमारदारों को चिंता थी कि जो दिल के दौरे से बच निकला, वह रोगी कोलाहल के हलाहल को पचा पाएगा कि नहीं? उनकी सांसों में सांस आई है। प्राणों का संकट अब सिर्फ सीमा की लड़ाई का ही सच नहीं, खुशी के त्योहार का यथार्थ भी है। महाभारत के वक्त रहे होंगे, अब न युद्ध के नियम हैं और न उत्सव के। ऐसे भी हमारे शहर की कानून-व्यवस्था, अनुपालन से कम, उल्लंघन से ज्यादा जानी जाती है। कायदे-कानून पर अमल कमजोर की पहचान है, और उसका अतिक्रमण ताकतवर की।

शहर में विनाश की आतिशबाजी के निशान नजर आ रहे हैं। शादी के बाद की सुबह का नजारा है। तंबू-कनात, कुरसी-मेज, वीडियो, भोजन-बर्तन वगैरह ठेकेदार ले जा चुके हैं। जो शेष है, वह जूठन और खाली खोखों की सार्वजनिक गंदगी है। उसे फैलाने वालों का सफाई से क्यों कोई लेना-देना हो? यह जिम्मेदारी नगरपालिका में पलते कामचोर कर्मचारियों की है। उनसे अधिक कार्यकुशल मोहल्ले की लावारिस श्वान सेना है। उसने जूठन का भरसक सफाया कर दिया है। जो बचा है, वह रात आकाश में काले धुंऐ से उड़ते काले धन के बुझे जमीनी चिन्ह हैं। आयकर से चुराया पैसा समृद्ध जी खोलकर फूंकते हैं। इसे वह घर के हवन कुंड में रखकर भी जला सकते थे। पर तब लोग उनकी इस विध्वंसक प्रतिभा के कायल कैसे होते? न हल्ला होता, न जानें जातीं, न प्रदूषण फैलता।

चारों ओर छाई चुप्पी सच्चाई से साक्षात्कार का भी समय है। दिनोंदिन बढती जा रही उधारी कैसे चुकता होगी? पेट काटकर, प्रसन्नता का प्रदर्शन आखिर कब तक संभव है? एक-दो दिन बिजली की लड़ियां लगाने वालों के अंतर में इतना अंधेरा पसरा है, तो सतत रोशनी बांटने वाले सूरज के भीतर क्या-क्या नहीं जल रहा होगा? उसे अनपेक्षित आश्वस्ति मिलती है। अभी उसमें जलने की और क्षमता है।

 

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  • Web Title:धमाकों के उत्सव की अगली सुबह