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हर खुशी हो वहां

हमारे आसपास जब भी कोई कहता है कि ‘आज मैं बहुत खुश हूं’, तो लोग उससे पूछ बैठते हैं, ‘क्यों? किस बात की खुशी हो रही है? कुछ मिल गया है क्या?’ इसका अर्थ यह हुआ कि हमारी खुशी दूसरों पर निर्भर है। कोई व्यक्ति, कोई घटना, कोई वस्तु, कुछ न कुछ न बाहर घटता है, तभी हमें खुशी होती है।

लेकिन इस तरह की खुशी हमें मजबूर इंसान बनाती है। लोग यही सोचते हैं कि खुशी बाहर से आती है, भीतर से नहीं, जबकि यह भी माना जाता है कि खुशी एक स्वतंत्र, आजाद भाव दशा है, जिसका स्रोत हर व्यक्ति के भीतर है। दरअसल, लोग खुश रहना भूल गए हैं, क्योंकि वे अपनी खुशी को किसी के ऊपर निर्भर रखते हैं। पत्नी की खुशी पति या बच्चों पर निर्भर है, तो मां की बेटों पर या पति की खुशी उसकी तरक्की पर। हजारों कारण होते हैं खुश होने के और वे सभी कारण बाहरी हैं। जो भी हमारे बाहर से आता है, वह हमारा नहीं हो सकता है। उस पर हमारा अधिकार नहीं है। अगर हम दूसरे के कारण खुश होते हैं, तो वही आदमी हमें दुखी भी कर सकता है। किसी ने हमारी तारीफ कर दी और हम खुश हो गए। निंदा की, तो दुखी हो गए। ऐसे तो हम दूसरों से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे।

ओशो पते की बात कहते हैं कि खुशी या प्रसन्नता सूरज की तरह है, जो हमारे भीतर ऊगता है और उसकी किरणें बाहर फैलती हैं। सच तो यह है कि खुश होने के लिए कोई कारण नहीं होता। आनंद को किसी कारण से बांधकर रखा, तो फिर वह असली आनंद नहीं होता। अब सवाल उठता है कि इस आनंद से संबंध कैसे बनाया जाए? इसके लिए पहले तो अपने आप से संबंध बनाना शुरू करें। रोज कुछ समय अपने साथ बिताएं, अपने भीतर जो उदासी या बोझिलता है, उसे दूर करते जाएं। जैसे ही आप भीतर गहरा तल छू लेंगे, वैसे ही असली आनंद का झरना फूट पड़ेगा।

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