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लोकतंत्र की मुश्किलें

सितंबर में संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने असंतुष्टों व नागरिक संगठनों के खिलाफ दमन पर ‘लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक सशक्त अभियान’ चलाने का वादा किया था। जब सब कुछ ‘असुविधाजनक’ या ‘संघर्ष को बढ़ाने’ वाला चल रहा था, तब उनका प्रशासन जुल्म के शिकार कार्यकर्ताओं की हिफाजत के लिए आगे आया और अभिव्यक्ति की आजादी व शांतिपूर्ण सभा करने के हक को प्रतिबंधित करने की कुछ सरकारों के प्रयासों का विरोध किया था। पर उस वादे से आगे ज्यादा कुछ नहीं हुआ, लेकिन अवसर अब भी हैं। मलयेशिया में इसकी तत्काल जरूरत दिखाई पड़ती है। वहां विपक्षी नेताओं, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के दमन की कार्रवाई हुई है। बीते दो महीनों में मलयेशियाई प्रधानमंत्री नजीब रजाक की सरकार ने दो दर्जन आंदोलनकारियों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया है। नजीब ने 2012 में यह वादा किया था कि वह इस कानून को खत्म कर देंगे। लेकिन इसकी बजाय सरकार अपने खिलाफ बोलने, लिखने या वीडियो अपलोड करने वालों को निशाना बना रही है। सरकार ने विपक्ष के नेता अनवर इब्राहिम के खिलाफ यौन-अपराध से जुड़े एक विवादास्पद मामले को फिर से खोल दिया है। अनवर मुस्लिम दुनिया के सर्वाधिक उदार लोकतांत्रिक नेता माने जाते हैं।  अगर 67 साल के अनवर मुकदमा हार जाते हैं, तो उन्हें न सिर्फ जेल जाना होगा, बल्कि राजनीतिक करियर भी खत्म हो जाएगा। अगर वह जीत जाते हैं, तब भी उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलेगा। यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं कि क्यों नजीब अपने वादे से मुकर गए। दरअसल, पिछले साल उनकी सत्तारूढ़ पार्टी आम चुनाव में अनवर के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने लोकप्रिय वोट गंवा बैठी। जालसाजी के आरोपों के बीच उन्हें संसदीय बहुमत तो मिल गया, लेकिन अब 2017 के चुनाव से पहले वह विपक्ष को कुचलने को आमादा हैं। अन्य मुस्लिम देशों की तरह मलयेशिया आंतरिक आतंकवाद की चुनौतियों से घिरा मुल्क नहीं है, पर शांतिपूर्ण विरोध का दमन करके नजीब सरकार कट्टरपंथियों के लिए रास्ता बना रही है।
द वाशिंगटन पोस्ट, अमेरिका

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