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पर्वतीय राज्यों में 40 हजार स्वयंसेवक लड़ रहे हैं हक की लड़ाई

अपने हकों की लड़ाई के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे एसएसबी के हजारों स्वयं सेवकों ने इस बार सरकार से आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला किया है। स्वयं सेवकों ने केंद्र सरकार से कहा है कि या तो वे गृह मंत्रलय द्वारा फरवरी में लिए गए निर्णय को लागू करें अन्यता एक दिसंबर से वे संसद के बाहर जोरदार प्रदर्शन शुरू करेंगे।

उत्तराखंड, हिमाचल के अलावा पूवरेत्तर के राज्यों में एसएसबी से जुड़े करीब 40 हजार स्वयं सेवक हैं जो पिछले आठ सालों से अपने हकों की लड़ाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दरअसल, गृह मंत्रलय ने 1962 के चीन युद्ध के बाद सीमावर्ती राज्यों में स्पेशल सिक्योरिटी ब्यूरो (एसएसबी) का गठन किया था जिनमें नौजवान युवक-युवतियों को बतौर स्वयंसेवक भर्ती किया जाता तथा उन्हें ग्वालदम, हिप्र, हॉफलोंग, ईटानगर, सिलिगुड़ी आदि स्थानों में 42 दिन की युद्ध ट्रेनिंग दी जाती। जिसमें राइफल चलाने से लेकर गुरिल्ला युद्ध तक की ट्रेनिंग शामिल है। बाद में इन्हीं प्रशिक्षित युवकों में से एसएसबी में भर्ती की जाती थी तथा बाकी लोगों को हर साल साल में 21 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता। इस दौरान उन्हें वर्दी तथा प्रशिक्षण अवधि का मानदेय दिया जाता। ये स्वयं सेवक निकटतम एसएसबी कार्यालय के संपर्क में रहते और गांवों में जानजागरण और राष्ट्रपति भक्ति का अभियान चलाते। लेकिन 2003 में सरकार ने यह सब कार्यक्रम बंद कर दिया।
 
तब से ये लोग संघर्षरत हैं। तमाम विरोध प्रदर्शनों के बाद इस साल फरवरी में गृह सचिव अनिल गोस्वामी की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने इनकी समस्याओं को सुना। इसमें दो अहम फैसले लिए गए। एक राज्यों को पत्र लिखा गया है कि जो स्वयंसेवक नौकरी के योग्य हैं, उन्हें राज्य अपनी सेवाओं में नौकरी दें। बाकी स्वयंसेवकों के लिए एकमुश्त आर्थिक सहायता या पेंशन सुविधा देने की बात कही गई। लेकिन यह प्रस्ताव चुनावों के चलते कैबिनेट में नहीं पहुंच सका। स्वयं सेवकों की मांग है कि सरकार इस पर अमल करे। वर्ना वे बड़ा आंदोलन करेंगे।

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