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किंग खान का फौजी से चार्ली तक का सफर

किंग खान का फौजी से चार्ली तक का सफर

जन्मदिन पर खास

भारतीय फिल्म अभिनेता और बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान का आज जन्मदिन है। उनका जन्म 2 नवम्बर 1965 में हुआ था। शाहरुख आज 49 वर्ष के हो चुके हैं। अक्सर मीडिया में इन्हें "बॉलीवुड का बादशाह", "किंग खान", "रोमांस किंग" और किंग ऑफ़ बॉलीवुड नामों से पुकारा जाता है। खान ने रोमैंटिक नाटकों से लेकर ऐक्शन थ्रिलर जैसी शैलियों में 75 हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है। फिल्म उद्योग में उनके योगदान के लिये उन्होंने तीस नामांकनों में से चौदह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते हैं। वे और दिलीप कुमार ही ऐसे दो अभिनेता हैं जिन्होंने साथ फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार आठ बार जीता है। 2005 में भारत सरकार ने उन्हें भारतीय सिनेमा के प्रति उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया।

अर्थशास्त्र में उपाधी ग्रहण करने के बाद इन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1980 में रंगमंचों व कई टेलिविज़न धारावाहिकों से की और 1992 में व्यापारिक दृष्टी से सफल फ़िल्म दीवाना से फ़िल्म क्षेत्र में कदम रखा। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर प्रथम अभिनय पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके पश्च्यात उन्होंने कई फ़िल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं अदा की जिनमे डर (1993), बाज़ीगर (1993) और अंजाम (1994) शामिल है। वे कई प्रकार की भूमिकाओं में दिखे व भिन्न-भिन्न प्रकार की फ़िल्मों में कार्य किया जिनमे रोमांस फ़िल्में, हास्य फ़िल्में, खेल फ़िल्में व ऐतिहासिक ड्रामा शामिल है।

उनके द्वारा अभिनीत ग्यारह फ़िल्मों ने विश्वभर में Indian Rupee symbol.svg 1 बिलियन का व्यवसाय किया है। खान की कुछ फ़िल्में जैसे दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995), कुछ कुछ होता है (1998), देवदास (2002), चक दे! इंडिया (2007), ओम शांति ओम (2007), रब ने बना दी जोड़ी (2008) और रा.वन (2011) अबतक की सबसे बड़ी हीट फ़िल्मों में रही है और कभी खुशी कभी ग़म (2001), कल हो ना हो (2003), वीर ज़ारा (2006)।

शुरुआती जीवन और शिक्षा
ख़ान के माता पिता पठान मूल के थे। उनके पिता ताज मोहम्मद ख़ान एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उनकी मां लतीफ़ा फ़ातिमा मेजर जनरल शाहनवाज़ ख़ान की पुत्री थी।

ख़ान के पिता हिंदुस्तान के विभाजन से पहले पेशावर के किस्सा कहानी बाज़ार से दिल्ली आए थे, हालांकि उनकी मां रावलपिंडी से आयीं थी। ख़ान की एक बहन भी हैं जिनका नाम है शहनाज़ और जिन्हें प्यार से लालारुख बुलाते हैं| ख़ान ने अपनी स्कूली पढ़ाई दिल्ली के सेंट कोलम्बस स्कूल से की जहां वह खेल क्षेत्र, शैक्षिक जीवन और नाट्य कला में निपुण थे| स्कूल की तरफ़ से उन्हें "स्वोर्ड ऑफ़ ऑनर" से नवाज़ा गया जो प्रत्येक वर्ष सबसे काबिल और होनहार विद्यार्थी एवं खिलाड़ी को दिया जाता था| इसके उपरांत उन्होंने हंसराज कॉलेज से अर्थशास्त्र की डिग्री एवं जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की मास्टर्स डिग्री हासिल की।

अपने माता पिता के देहांत के उपरांत ख़ान 1991 में दिल्ली से मुंबई आ गए| 1991 में उनका विवाह गौरी ख़ान के साथ हिंदू रीति रिवाज़ों से हुआ| उनकी तीन संतान हैं - एक पुत्र आर्यन (जन्म 1997) और एक पुत्री सुहाना (जन्म 2000), व पुत्र अबराम (2013)।

अभिनय की शुरुआत
ख़ान ने अभिनय की शिक्षा प्रसिद्द रंगमंच निर्देशक बैरी जॉन से दिल्ली के थियेटर एक्शन ग्रुप में ली। ख़ान ने अपना करियर 1988 में दूरदर्शन के धारावाहिक "फ़ौजी" से प्रारम्भ किया जिसमे उन्होंने कमान्डो अभिमन्यु राय का किरदार अदा किया। उसके उपरांत उन्होंने और कई धारावाहिकों में अभिनय किया जिनमे प्रमुख था 1989 का "सर्कस", जिसमे सर्कस में काम करने वाले व्यक्तियों के जीवन का वर्णन किया गया था और जो अज़ीज़ मिर्ज़ा द्वारा निर्देशित था। उस ही वर्ष उन्होंने अरुंधति राय द्वारा लिखित अंग्रेज़ी फ़िल्म "इन विच एनी गिव्स इट दोज़ वंस" में एक छोटा किरदार निभाया। यह फ़िल्म दिल्ली विश्वविद्यालय में विद्यार्थी जीवन पर आधारित थी।

अपने माता पिता की मृत्यु के उपरांत 1991 में ख़ान नई दिल्ली से मुंबई आ गये। बॉलीवुड में उनका प्रथम अभिनय "दीवाना" फ़िल्म में हुआ जो बॉक्स ऑफिस पर सफल घोषित हुई। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर की तरफ़ से सर्वश्रेष्ठ प्रथम अभिनय का अवॉर्ड मिला। उनकी अगली फ़िल्म थी "माया मेमसाब" जो नहीं चली| 1993 की हिट फ़िल्म "बाज़ीगर" में एक हत्यारे का किरदार निभाने के लिए उन्हें अपना पहला फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला| उस ही वर्ष में फ़िल्म "डर" में इश्क़ के जूनून में पागल आशिक़ का किरदार अदा करने के लिए उन्हें सरहाया गया| इस वर्ष में फ़िल्म "कभी हां कभी ना" के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर समीक्षक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 1994 में ख़ान ने फ़िल्म "अंजाम" में एक बार फिर जुनूनी एवं मनोरोगी आशिक़ की भूमिका निभाई और इसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार भी मिला।

1995 में उन्होंने आदित्य चोपड़ा की पहली फ़िल्म "दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे" में मुख्य भूमिका निभाई| यह फ़िल्म बॉलीवुड के इतिहास की सबसे सफल और बड़ी फिल्मों में से एक मानी जाती है| मुंबई के कुछ सिनेमा घरों में यह 12 सालों से चल रही है। इस फ़िल्म के लिए उन्हें एक बार फिर फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार हासिल हुआ|

1996 उनके लिए एक निराशाजनक साल रहा क्यूंकि उसमे उनकी सारी फिल्में असफल रहीं। 1997 में उन्होंने यश चोपड़ा की दिल तो पागल है, सुभाष घई की परदेश और अज़ीज़ मिर्ज़ा की येस बॉस जैसी फिल्मों के साथ सफलता के क्षेत्र में फिर कदम रखा।

वर्ष 1998 में करण जोहर की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म 'कुछ कुछ होता है' उस साल की सबसे बड़ी हिट घोषित हुई और ख़ान को चौथी बार फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार हासिल हुआ। इसी साल उन्हें मणि रत्नम की फ़िल्म 'दिल से' में अपने अभिनय के लिए फ़िल्म समीक्षकों से काफी तारीफ मिली और यह फिल्म भारत के बाहर काफी सफल रही।

अगला वर्ष उनके लिए कुछ ख़ास लाभकारी नहीं रहा क्यूंकि उनकी एक मात्र फ़िल्म, बादशाह, का प्रदर्शन स्मरणीय नहीं रहा और वह औसत व्यापार ही कर पायी। सन 2000 में आदित्य चोपड़ा की 'मोहब्बतें' में उनके किरदार को समीक्षकों से बहुत प्रशंसा मिली और इस फ़िल्म के लिए उन्हें अपना दूसरा फ़िल्मफ़ेयर समीक्षक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला| उस ही साल आई उनकी फ़िल्म 'जोश' भी हिट हुई| उस ही वर्ष में खान ने जूही चावला और अज़ीज़ मिर्ज़ा के साथ मिल कर अपनी ख़ुद की फ़िल्म निर्माण कम्प्नी, 'ड्रीम्ज़ अन्लिमिटिड', की स्थापना की। इस कम्प्नी की पहली फ़िल्म 'फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी', जिसमे ख़ान और चावला दोनों ने अभिनय किया, बॉक्स ऑफिस पर जादू बिखेरने में असमर्थ रही। कमल हसन की विवादग्रस्त फ़िल्म 'हे राम' में भी ख़ान ने एक सहयोगी भूमिका निभाई जिसके लीये उन्हें समीक्षकों ने सराहा हालांकि यह फ़िल्म भी असफल श्रेणी में रही।

सन 2001 में ख़ान ने करण जोहर के साथ अपनी दूसरी फ़िल्म 'कभी खुशी कभी ग़म' की, जो एक पारिवारिक कहानी थी और जिसमें अन्य भी कई सितारे थे। यह फ़िल्म उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्मों की सूची में शामिल थी। उन्हें अपनी फ़िल्म 'अशोका', जो की ऐतिहासिक सम्राट अशोक के जीवन पर आधारित थी, के लिये भी प्रशंसा मिली लेकिन यह फ़िल्म भी नाकामियाब रही। साल 2002 में ख़ान ने संजय लीला भंसाली की दुखांत प्रेम कथा देवदास में मुख्य भूमिका अदा की जिसके लिए उन्हें एक बार फिर फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार दिया गया| यह शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास देवदास पर आधारित तीसरी हिन्दी फ़िल्म थी।

अगले साल ख़ान की दो फ़िल्में रिलीज़ हुईं, 'चलते चलते' और 'कल हो ना हो'। 'चलते चलते' एक औसत हिट साबित हुई लेकिन 'कल हो ना हो', जो की करण जोहर की तीसरी फ़िल्म थी, राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही बाज़ारों में काफ़ी कामियाब रही| इस फ़िल्म में ख़ान ने एक दिल के मरीज़ का किरदार निभाया जो मरने से पहले अपने चारों ओर खुशियां फैलाना चाहता है और इस अदाकारी के लिये उन्हें सरहाया भी गया।

2004 ख़ान के लिये एक और महत्वपूर्ण वर्ष रहा। इस साल की उनकी पहली फ़िल्म थी फ़राह खान निर्देशित मैं हूं ना, जो ख़ान द्वारा सह-निर्मित भी थी| यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट सिद्ध हुई| उनकी अगली फ़िल्म थी यश चोपड़ा की 'वीर ज़ारा', जो उस साल की सबसे कामयाब फ़िल्म थी और जिसमे खान को अपने अभिनय के लिये कई अवॉर्ड और बहुत प्रशंसा मिली। उनकी तीसरी फ़िल्म थी आशुतोष गोवारिकर निर्देशित 'स्वदेश', जो दर्शकों को सिनेमा-घरों में लाने में तो सफल ना हो सकी लेकिन उसमें ख़ान के भारत लौटे एक अप्रवासी भारतीय की भूमिका को सरहाया गया और खान ने अपना छठवां फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार जीता।

साल 2005 में उनकी एकमात्र फ़िल्म 'पहेली' (जो की अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित थी) बॉक्स ऑफिस पर असफल रही हाला की उसमे ख़ान के अभिनय को सरहाया गया। 2006 में ख़ान एक बार फिर करण जोहर की फ़िल्म 'कभी अलविदा ना कहना' में देखे गये जो एक अति नाटकीय फ़िल्म थी| इस फ़िल्म ने भारत में तो सफलता प्राप्त की ही, साथ ही साथ यह विदेश में सबसे सफल हिन्दी फ़िल्म भी बन गई। उस ही वर्ष खान ने 1978 की हिट फ़िल्म 'डॉन' की रीमेक डॉन में भी अभिनय किया जो एक बड़ी हिट सिद्ध हुई।

2007 में ख़ान की दो फिल्में आई है - 'चक दे इंडिया' और 'ओम शान्ति ओम। 'चक दे! इंडिया' में ख़ान भारतीय महिला हॉकी टीम के कोच के किरदार में नज़र आते हैं जिनका लक्ष्य है भारत को विश्व कप दिलवाना। इस किरदार की लिये खान को समीक्षकों से तोह खासी प्रशंसा मिली ही है साथ ही साथ यह फ़िल्म एक विशाल हिट भी सिद्ध हुई है। 2007 की दूसरी फ़िल्म ओम शान्ति ओम में भी नज़र आए ये फराह खान की शाहरुख़ खान के साथ दूसरी फ़िल्म थी| इसमें खान ने दोहरी भूमिका निभाई| पहला किरदार ओम एक जूनियर कलाकार है और एक हादसे में मारा जाता है और दूसरा एक नामी अभिनेता ओम कपूर है। ये फ़िल्म भी 2007 की एक सफल फ़िल्म थी।

इस वर्ष हाल ही में उनकी फिल्म "हैप्पी न्यू ईयर" रिलीज हुई है जिसमें चंद्रमोहन शर्मा उर्फ चार्ली के नाम से शाहरुख ने किरदार निभाया है। चार्ली के पिता यानि के अनुपम खेर ने इस फिल्म में 'सेफ' बनाने में एक्सपर्ट थे। वे चरण ग्रोवर (जैकी श्रॉफ) के लिए एक बहुत बड़ा सेफ बनाते हैं जिसका नाम है 'शालीमार'। चार्ली के पिता के साथ चरण ग्रोवर षड्यंत्र करता है और उन्हें जेल हो जाती है जिसका बदला लेने के लिए चार्ली शालीमार में रखे 300 करोड़ रुपए के हीरे चुराना चाहता है। देखा जाए तो शाहरुख ने अपने फिल्मी जीवन के साथ-साथ पारिवारिक जीवन में भी अच्छी भूमिका निभाई है।

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