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‘संपूर्ण क्रांति’ के आगे का सच

आपने ध्यान दिया क्या? आज से दो दिन बाद चार नवंबर है। इस तारीख का भारतीय राजनीतिक इतिहास में निश्चित मुकाम है। 40 साल पहले इसी दिन एक क्रांति की भव्य शुरुआत हुई थी, जो ‘अधूरी’ रह गई। अधूरी! क्यों? इसे समझने के लिए कृपया अगली पंक्तियों को गौर से पढ़ें-

‘मैं शुरू से ही यह कहता आ रहा हूं कि हमारे आंदोलन का लक्ष्य है ‘संपूर्ण क्रांति’। इस आंदोलन का मकसद सिर्फ सरकार बदलना नहीं है, बल्कि व्यक्ति और समाज में भी बदलाव लाना है। इसीलिए मैंने इसे संपूर्ण क्रांति कहा है। आप इसे ‘विशद क्रांति’ कह सकते हैं। ‘संपूर्ण’ और ‘विशद’ के अर्थों में कुछ फर्क है, लेकिन मेरे लिए दोनों का मतलब लगभग एक ही है। एक विशद क्रांति संपूर्ण भी हो सकती है... और यह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे एक दिन या एक-दो साल में हासिल किया जा सकता है। इसके लिए हमें लंबे वक्त तक संघर्ष करना होगा, और इसके साथ-साथ हमें सृजनात्मक और मौलिक कार्यक्रम भी चलाने होंगे। संपूर्ण क्रांति के लक्ष्य को पाने के लिए संघर्ष और सृजन की यह दोहरी प्रक्रिया बहुत जरूरी है। ...अब सवाल उठता है कि मौजूदा हालात में संपूर्ण क्रांति के लिए क्या करना चाहिए? इससे संबंधित कार्य के चार पहलू हैं- संघर्ष, सृजन, प्रचार और संगठन। मौजूदा हालात में हमें सृजनात्मक पहलू पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, हमारे कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा लोगों, नौजवानों को दहेज प्रथा, जातिवादी भेदभाव, अस्पृश्यता, सांप्रदायिकता आदि दानवी प्रवृत्तियों के खिलाफ जहनी तौर पर तैयार करने का होना चाहिए।’

ये पंक्तियां उस खत का हिस्सा हैं, जिसे जयप्रकाश नारायण ने 1975 में बिहार की जनता को लिखा था। उन दिनों मैं हाई स्कूल का छात्र था और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर मैनपुरी में रहता था। देश गहरे असंतोष और पीड़ा के दौर से गुजर रहा था। हमारे आसपास तमाम लोग ऐसे थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी अथवा 15 अगस्त,1947 के जोश-जुनून को गौर से देखा था। उन्हें लगता था कि देश भटक गया है और आजादी अपना अर्थ खो बैठी है। हम विक्टोरिया वंश की हुकूमत से मुक्त होने के बाद दूसरे वंशवाद के चक्रव्यूह में उलझ गए हैं। अवसाद और कुंठा के उन कष्टपूर्ण लम्हों में जेपी यानी जयप्रकाश नारायण उम्मीद की किरण के तौर पर उभरे थे।

दो साल पहले गुजरात के एक छात्रावास में खाने की फीस में बढ़ोतरी को लेकर शुरू हुआ आंदोलन इस दावानल की पहली चिनगारी साबित हुआ था। बिहार, उत्तर प्रदेश और देश के तमाम हिस्सों में नौजवान अपने घरों से निकल रहे थे। उन्हें लगता था कि गांधी के बाद जेपी उम्मीद की अगली मशाल हैं। ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान के 40 साल गुजरने के बाद पलटकर देखने पर आप क्या पाते हैं? जेपी के आंदोलन का क्या हश्र हुआ? इसके साथ ही उन हजारों लोगों के सपनों की चिताओं पर भी नजर डालिए, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज छोड़े, लाठियां खाईं और आज अपने ही देश में बेगानों की तरह पुरानी चोटें सहलाते नजर आते हैं।

अक्सर कहा जाता है कि इस आंदोलन की कोख से निकले लोग भ्रष्ट हो गए। उन्होंने जातिवाद को हवा दी। भारतीय राजनीति के विकृतिकरण की शुरुआत भी इस आंदोलन की देन है। इसे सिर्फ आंशिक सत्य मानिए। कुछ नेताओं के रास्ता भटक जाने से देश नहीं भटका करते। इस मुहिम के बाद ही उत्तर भारत की राजनीति में बड़े परिवर्तन की शुरुआत हुई। इससे पहले पिछड़ा वर्ग लोकतंत्र में ज्यादातर वोटर की भूमिका निभाता था। हुकूमत पर उन लोगों का कब्जा होता था, जो हाईकमान के करीबी होते थे।

राममनोहर लोहिया ने इस ताकत को पहचानकर 1960 के दशक में चिंतन भरा सियासी आंदोलन तो शुरू किया, पर उसे मुकाम पर पहुंचना शेष था। जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ ने हमारे गांवों की सियासी संरचना ही बदल दी। अब तक हाशिये से राजमहलों को ताक रहे पिछड़े, अगली कतारों में जा बैठे। इसी के बाद दलितों के उभार की भी शुरुआत हुई। तब क्या किसी ने सोचा था कि कांशीराम ‘डीएस-4’ के जरिये एक आंदोलन खड़ा करेंगे और अगले कुछ साल में बसपा मजबूत सियासी पार्टी के रूप में उभरेगी? यह जेपी की मुहिम का अगला चरण था, जिसे देखने-समझने को वह मौजूद नहीं थे।

भारतीय लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी खूबी है। हम बंदूकों के जोर पर क्रांतियां नहीं करते। पहले ‘बैलेट’ और अब ‘ईवीएम’ बदलाव की साक्षी बन गई है। मुझे 1974 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव याद है। जेपी तब तक मैदान में कूदे नहीं थे। विधानसभा के उस चुनाव में सैकड़ों ‘पोलिंग बूथों’ पर दलितों को वोट डालने से रोक दिया गया था। क्या आज ऐसा संभव है?

फिर ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान की ओर लौटते हैं। उस समय आरोप लगाए गए थे कि जेपी का इंकलाब संघ परिवार की उपज है। यह ठीक है कि नानाजी देशमुख की अगुवाई में संघ का काडर इस आंदोलन से जुड़ गया था, पर उनका उद्देश्य ‘संपूर्ण क्रांति मार्का’ बदलाव नहीं था। उन्हें इंदिरा गांधी की शक्ल में एक ऐसा ताकतवर सियासी शत्रु नजर आता था, जिससे जूझने के लिए इस स्तर की लड़ाई जरूरी थी। लोहिया कहा करते थे कि राजनीति में इस समय शून्य है। एक तरफ इंदिरा हैं, बाकी सब उनके विरोध में हैं। लोहिया ने इस खालीपन को खत्म करने की शुरुआत की थी। जेपी ने उसे आगे बढ़ाया। संघ परिवार यकायक हाथ में आया यह अवसर नहीं गंवाना चाहता था।

इसका एक फायदा हुआ। अगर मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार जैसे समाजवादी तेवर के नौजवान इस आंदोलन के जरिये राजनीतिक यौवन की ओर बढ़े, तो सुशील मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे युवा नेता भी अपने तेवर तीखे करने के अभियान पर निकल पड़े। वह ऐसा दौर था, जब नौजवानी संकल्पपूर्ण जज्बे से भरपूर थी और विचारधाराएं गौण हो गई थीं। संपूर्ण क्रांति के नारे की शक्ल में युवा ‘दूसरी आजादी’ की लड़ाई लड़ रहे थे। यही वजह थी कि कस्बों और शहरों में रह-रहकर गूंज उठता था- संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है।

यह ठीक है कि ‘संपूर्ण क्रांति’ के सपने आने वाले वर्षों में छितरा गए, पर जैसा कि मैंने पहले अनुरोध किया कि क्रांतियां हमारे हिन्दुस्तान में दबे पांव आती हैं। हम हिंसा में यकीन नहीं करते। फिर जिन जगहों पर खूनी बदलाव हुए, वहां क्या हुआ? चीन में माओ ने बंदूक के बल पर सत्ता कब्जाई थी। आज वहां की कम्युनिस्ट पार्टी उनका नाम तक लेना पसंद नहीं करती। लेनिन के ठीक बाद सत्ता में आए स्तालिन ने सोवियत संघ में समाजवादी सोच की धज्जियां उड़ा दीं। नतीजतन, सोवियत संघ बिखर गया और आज रूस एक पूंजीवादी देश है। अच्छा है कि भारतीय परिवर्तन की शुरुआत अपने अंदर से करते हैं। यह सिलसिला धीमा, पर स्थायी है।
‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान भी ऐसी ही प्रक्रिया थी। इसने दूरगामी असर छोड़े। भूलें नहीं। आंदोलन और आंदोलनकारी एक निश्चित समय की उपज होते हैं। जिस तरह नश्वर लहरें धीमे-धीमे नदियों की धाराएं बदलती हैं, वैसे ही वे अपना काम कर विदा हो जाते हैं। लोहिया, जेपी, कांशीराम या फिर आज के अन्ना हजारे इसके उदाहरण हैं।

 

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