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जो है उपनाम वाला

नाम में कुछ नहीं रखा, लेकिन उपनाम में बहुत कुछ रखा है। नाम से बड़ा उपनाम होता है। आदमी किसी का नाम भूल जाए, उपनाम नहीं भूल पाता। उपनाम लेखक का ‘ब्रांड’ होता है। उपनाम लेखक को डबल पर्सनैलिटी देता है। एक में दो-दो बंदे नजर जाते हैं- ‘टू इन वन।’
उपनाम वाला लेखक पाठक को अतिरिक्त प्रिय होता है। वह उपनाम के जरिये पाठक से लुका-छिपी खेलता है। उपनाम, लेखक और पाठक के बीच ‘क्रीड़ा कंदुक’ का काम करता है। पाठक उपनाम देखता है, तो सोचता है कि शायद यही लेखक का नाम है, लेकिन जब कोई उसे बताता है कि वह तो अपना ‘मुन्ना’ है, तो पाठक चौंकता है। जब मालूम पड़ता है कि उसका असल नाम तो ‘लड्डू गोपाल’ था और यह साहित्यिक किस्म का नहीं था, तो इस ‘एलजी’ ने ‘प्रत्यूष’ उपनाम रख साहित्य में प्रवेश किया।
उपनाम घर से शुरू होता है। माता-पिता लाड़ से मुन्ना या छोटू कहने लगते हैं और गली-मुहल्ले में चल पड़ता है। नाम राजेंद्र है, तो रज्जू हुआ और अशोक है, तो ‘शोकी’ या ‘शुक्कू’ हुआ। जिसे पंडित ने राशि निकालकर ‘घ’ से ‘घूरा’ बनाया, वही कल को ‘पल्लव जी’ हो सकता है। साहित्य का जनतंत्र उपनाम से बनता है।
उपनाम बड़े काम का होता है। जब नाम ढेले पड़वाता है, तो उपनाम ही ढाल बनकर बचाता है। उपनाम के मामले में हमारे प्रिय महाकवि आदरणीय ‘अज्ञेय’अद्वितीय हैं। पाठकों के बीच ‘अज्ञेय’ कब गायब हो जाते और उनकी जगह ‘सच्चिदानंद वात्स्यायन’ आ जाते, कब ‘सच्चिदानंद’ के आगे ‘हीरानंद वात्स्यायन’ जुड़ जाते, कब इनकी जगह सिर्फ ‘कुट्टिचातन’ हो जाते, पता नहीं चलता। अज्ञेय अकेले रहे, जिन्होंने नाम और उपनाम के बीच का फर्क ही मिटा दिया। इसीलिए आज भी हिंदी में एमए करने वाले विद्यार्थी उनके पूरे नाम को रटकर आते हैं, ताकि ‘अज्ञेय का संपूर्ण नाम लिखिए’ जैसा सवाल आए, तो सही जवाब लिख सकें। 
हिंदी में सबसे प्रसिद्ध उपनाम रहा ‘शिवशंभु’ का, जिनके चिट्ठे जब छपते, तो लाट कर्जन तक पहुंचते। वे अंग्रेजी राज की खिंचाई करने वाले होते। लाट कर्जन को हर लाइन में लतियाया जाता, मगर इस अंदाज से कि लाट साहब की भृकुटि न तने। असली लेखक रहे बाल मुकुंद गुप्त, पर उपनाम ‘शिवशंभु’ में ‘गुप्त।’ उपनाम भी रखा तो सटीक। ‘शिवशंभु’, यानी डबल शिव। जहां दो-दो शिव हों, तो डबल बूटी चौगुनी होकर ही चढ़ेगी और ऐसे चिट्ठे लिखे जाएंगे, जो इतिहास बन जाएं। यह बूटी का ही परताप रहा कि शिवशंभु के चिट्ठे आज तक व्यंग्य लिखने की तमीज सिखाने वाले हैं। अगर हिंदी में खिंचाई साहित्य की परंपरा कमजोर हुई है, तो उसका कारण यही है कि आज के साहित्यकार बूटी-विमुख हो गए हैं। वे जब से बोतलोन्मुख हुए हैं, तब से उपनाम रखना तक भूल गए हैं। एक यह ‘तिरछी नजर’ वाला ही बेशर्मी से उपनाम की परंपरा को गालियां खाकर भी निभाए जाता है।

नाम को उपनाम की तरह चलाने का क्या फायदा है? इसे न जानते हों, तो जैनेंद्र का यह किस्सा सुन लीजिए। 1968 के किसी महीने में जैनेंद्र दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में भाषण देने पधारे, तो एक श्रोता ने उनसे पूछा कि जैनेंद्र जी आप लेखक हैं और प्रकाशक भी हैं। आप यहां ईमानदारी की बात कर रहे हैं, लेकिन आप कई लेखकों की पूरी रॉयल्टी तक नहीं देते। जैनेंद्र जी ने कहा कि भाई! वह प्रकाशक जैनेंद्र दरियागंज में मिलता है और जो यहां है, वह लेखक जैनेंद्र है। इस पर जो ठहाका पड़ा, तो सवाल करने वाले का मुंह निकल आया।

 

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