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मुझे कभी जोखिम से डर नहीं लगा

मेरी सफलता के पीछे कोई राज नहीं है। आप जोखिम लेंगे, तो सफलता की संभावना बन जाएगी। जोखिम के डर से चुप बैठे रहे, तो आपकी विफलता तय है। सच कहूं, तो मुझे कभी जोखिम लेने से डर नहीं लगा।

अगर आप फेसबुक के बारे में जानते हैं, तो आपको मेरे बारे में भी जानना चाहिए। आखिर, मैंने ही आपको दुनिया से संवाद करने का बेहतरीन मंच मुहैया कराया। मेरा मतलब फेसबुक से है। मेरा पूरा नाम मार्क इलियट जकरबर्ग है। वैसे मेरे दोस्त मुझे जक कहकर पुकारते हैं और मां प्यार से प्रिंसली कहती हैं। मेरा जन्म अमेरिका के न्यूयॉर्क में हुआ। परिवार में सभी लोग काफी पढे़-लिखे थे। मेरे नाना जी बुल्गारिया के थे। मम्मी ने बताया था कि वह 1940 में बुल्गारिया से अमेरिका आए और फिर यहीं बस गए। मेरे पिता एडवर्ड जकरबर्ग दांतों के डॉक्टर थे और मम्मी मनोचिकित्सक। मैं तीन बहनों के बीच अकेला  भाई हूं। बचपन में मुझे सबका बहुत दुलार मिला, खासकर अपनी बहनों का।

मेरी पढ़ाई को लेकर मम्मी-पापा शुरू से बहुत संजीदा थे। जब मैं  स्कूल में पढ़ता था, तब पापा ने मुझे कंप्यूटर कोर्स की किताब लाकर दी। किताब का नाम था सी प्लस प्लस फॉर डमीज। मैं तो बस किताब में खो गया। सच कहूं, तो इस किताब ने मेरे अंदर कंप्यूटर प्रोग्राम के प्रति गहरी दिलचस्पी पैदा की। बस कुछ दिनों के अंदर मैंने कंप्यूटर पर जकनेट नाम का एक प्रोग्राम डेवलप कर दिया। यह कंप्यूटर पर संदेश भेजने वाला प्रोग्राम था। इसके जरिये परिवार के लोग आपस में चैट करने लगे। वाकई यह बहुत दिलचस्प आविष्कार था। हां, मैं इसे आविष्कार ही कहूंगा, क्योंकि इससे पहले हमने कभी नहीं सोचा था कि कंप्यूटर पर इस तरह लोग आपस में बातचीत कर सकते हैं। जब मैंने मम्मी-पापा को इस प्रोगाम के बारे में बताया, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। फिर मैंने उन्हें कंप्यूटर पर संदेश भेजकर दिखाया। वे बहुत खुश हुए। घर के निश्चित दायरे में हम आपस में कंप्यूटर पर बातचीत करने लगे। उन दिनों यह नई बात थी, लिहाजा इस प्रोग्राम का इस्तेमाल करना हमारे पूरे परिवार के लिए काफी रोमांचकारी था। आगे चलकर मैंने सोचा, क्यों न दुनिया के सारे लोगों को आपस में जोड़ा जाए। यहीं से फेसबुक की शुरुआत हुई। मुझे नए-नए प्रयोग करना बहुत अच्छा लगता है। अब तक मैंने 50 कंप्यूटर प्रोग्राम बनाए और इनका पेटेंट भी कराया है।

हाईस्कूल में पढ़ाई के दौरान मैंने साइनेप्पस नाम एक प्रोग्राम तैयार किया। इस प्रोग्राम की मदद से यूजर्स की संगीत सीखने की क्षमता को आंका जा सकता था। इस प्रोग्राम की बहुत तारीफ हुई। एओएल और माइक्रोसॉफ्ट आईटी कंपनियों को भी साइनेप्पस प्रोग्राम काफी पसंद आया। दोनों कंपनियों ने मुझे नौकरी का ऑफर दिया।  मेरे लिए नौकरी का वह पहला ऑफर था। इस कामयाबी से मेरा उत्साह बढ़ गया। पर प्रोग्रामिंग के साथ ही मुझे आगे की पढ़ाई पर भी फोकस करना था। लिहाजा स्कूली पढ़ाई के बाद मैं हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी गया, जहां मैंने हिब्रू, लैटिन और प्राचीन ग्रीक भाषा सीखी। हॉर्वर्ड में पढ़ाई के दौरान मैंने फेसमाश नाम की वेबसाइट तैयार की। इस पर मैंने छात्रों की तस्वीरें लोड कीं और लोगों से कहा कि वे फोटो के आधार पर आकर्षक छात्रों का चुनाव करें। यह एक तरह से वेबसाइट और लोगों के बीच संवाद कायम करने का प्रयास था। यह प्रयोग सफल रहा। लोगों ने मेरे आइडिया की काफी तारीफ की।

इस दौरान मेरे मन में ख्याल आया कि इंटरनेट केवल एकतरफा माध्यम नहीं होना चाहिए। मैंने सोचा, क्यों न इंटरनेट पर एक ऐसा मंच तैयार किया जाए, जहां लोग आपस में जुड़ सकें। चार फरवरी 2004 को मैंने फेसबुक डॉट कॉम  की शुरुआत की। यह कंपनी मैंने अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर शुरू की। शुरुआत में फेसबुक को केवल यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए तैयार किया गया था, पर 2006 में फेसबुक दुनिया के सभी लोगों के लिए खुल गया।

फेसबुक की सफलता ने मुझे पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया। रातोंरात सब कुछ बदल गया। फेसबुक लांच के बस एक साल बाद यानी 2007 में मैं अरबपति बन गया। तब मेरी उम्र मात्र 23 साल की थी। 2010 में टाइम  ने मुझे दुनिया के सौ अरबपतियों की सूची में शुमार किया। इसी साल सोशल नेटवर्क नाम की फिल्म बनी, जो मेरी कंपनी फेसबुक पर आधारित थी। इसमें मशहूर अभिनेता जेस एसिनबर्ग ने मेरे अंदाज और मेरी कामयाबी को परदे पर उतारा। यह सब एक सपने जैसे था। फेसबुक लांच करते समय मैंने इतनी बड़ी कामयाबी की कल्पना नहीं की थी। लोगों को संवाद का यह मंच बहुत पसंद आया। फेसबुक यूजर्स की संख्या तेजी से बढ़ती गई। वर्ष 2012 में दुनिया भर में फेसबुक यूजर्स की संख्या एक अरब पार कर गई। क्या आप जानते हैं कि फेसबुक पेज का रंग नीला क्यों है? यह एक दिलचस्प बात है। पहली बात तो यह है कि नीला रंग मुझे बहुत पसंद है। दूसरी यह कि लाल और हरा रंग मुझे नजर नहीं आता है।

यकीनन फेसबुक ने मुझे भरपूर दौलत और शोहरत दिलाई, पर मेरा हमेशा से मानना रहा है कि एक उद्यमी का मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं होना चाहिए। समाज के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है, हम इससे आंखें नहीं फेर सकते। मुझे खुशी है कि पिछले साल मुझे और मेरी पत्नी को अमेरिका के पचास सबसे दानवीर लोगों में शामिल किया गया। हमने करीब एक अरब डॉलर का दान दिया। इस साल अक्तूबर में मैंने इबोलो से निपटने के लिए अफ्रीका को 25 मिलियन डॉलर दिए। यह मदद बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन अगर हर इंसान अपने स्तर से एक छोटी पहल करे, तो यह बड़ी मदद बन सकती है।

फेसबुक का सफर बेहद रोमांचकारी रहा और इस दौरान मेरी निजी जिंदगी भी काफी दिलचस्प रही। फेसबुक लांच के एक साल पहले मेरी मुलाकात प्रीसीला चान से हुई। वह चीन-वियतमान के शरणार्थी माता-पिता की बेटी हैं। जल्द ही वह मेरी अच्छी दोस्त बन गईं। प्रीसीला उन चंद लोगों में हैं, जो फेसबुक लांच होने के अगले दिन इसके सदस्य बने थे। मुझे उनसे प्यार हो गया। हमारे प्यार का सिलसिला नौ साल चला और  फिर 19 मई, 2012 को मैंने प्रीसीला से शादी कर ली।

लोग अक्सर मुझसे मेरी कामयाबी  का राज पूछते हैं। मुझे लगता है कि इसमें कोई राज नहीं है। सबसे बड़ी दिक्कत है हमारा डर। लोग जोखिम लेने से डरते हैं। मैं मानता हूं कि नुकसान जोखिम लेने में नहीं, बल्कि जोखिम से डरने में है। दुनिया तेजी से बदल रही है, और ऐसे में हम डरकर चुप नहीं बैठ  सकते हैं। अगर हम जोखिम लेकर नया कदम उठाते हैं, तो सफलता की पूरी संभावना होगी और अगर हम जोखिम नहीं लेंगे, तो विफ लता तय है। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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