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प्यासे रह जाते आगरा के लोग

गोकुल बैराज परियोजना में 11 राजस्व ग्राम पंचायतों की करीब 248.75 हेक्टेयर भूमि यमुना में समा गई। इसके चलते 942 परिवार भूमिहीन हो गए। किसानों ने मुआवजा लेने की लड़ाई गोकुल बैराज का उद्घाटन होने के पहले ही दिन शुरू कर दी थी। जिला प्रशासन पहले तो किसानों को घुट्टी पिलाता रहा। दबाव बढ़ा तो जांच के आदेश हो गए। जैसे-तैसे छह राजस्व गांवों का मुआवजा फाइनल हुआ तो किसानों ने पुराने सर्किल रेट से मुआवजा राशि लेने से इंकार कर दिया।

गोकुल बैराज परियोजना का खाका बीस वर्ष पूर्व खींचा गया था। तब तय हुआ था कि बैराज से प्रभावित किसानों को मुआवजा दिलाया जायेगा। ये वह किसान थे जिनकी कृषि भूमि यमुना खादर से लगी हुई थी। बैराज बनने से मथुरा नगर तक यमुना नदी में पानी भरा रहने से किसानों की भूमि स्थायी तौर पर उनके कब्जे से चली गई। इसे डूब क्षेत्र मानते हुए जिला प्रशासन ने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत कार्यवाही की। किसानों ने गोकुल बैराज के पानी और अन्य मदों से होने वाले लाभ में से भी लाभांश दिलाने की मांग उठायी। किसान यह भी चाहते थे कि पीड़ितों को भूविस्थापित मानते हुए पुनर्वास की व्यवस्था करायी जाए।

कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर ने बताया कि करीब सात राजस्व गांवों के किसानों की भूमि का मुआवजा लेनेदेन में फंसा दिया गया था। इसमें जिला प्रशासन की भूमिका संदिग्ध रही थी। किसानों के हित में कांग्रेस ने कई बड़े आंदोलन किए। सात राजस्व गांवों की डूब क्षेत्र कृषि भूमि में धारा-4 और धारा-6 की कार्यवाही नहीं हुई। इसी से मुआवजा लम्बे समय तक अटका रहा। पिछले दिनों प्रदेश की सपा सरकार ने धारा-4 समाप्त होने के कारण धारा-6 का प्रकाशन करा दिया। एक राजस्व गांव उसमें से रह गया। इसके लिये लगातार प्रयास किए जा रहे थे। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि किसानों को मुआवजा मिलने वाला था तभी श्रेय लेने की होड़ लग गई। किसानों को नये सर्किल रेट पर मुआवजा लेने के लिये भड़का दिया गया। प्रदीप माथुर ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव देवेंद्र प्रताप सिंह और पार्टी नेताओं के साथ गोकुल बैराज घटनास्थल का मुआयना किया और पीड़ित किसानों से बातचीत भी की। उनके साथ जिलाध्यक्ष आबिद हुसैन व नगर अध्यक्ष मलिक अरोड़ा भी थे।

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