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दहेज हत्या में उम्रकैद की सजा नहीं : सुप्रीम कोर्ट

दहेज हत्या में उम्रकैद की सजा नहीं : सुप्रीम कोर्ट

दहेज हत्या भले ही क्रूर अपराध हो लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसमें दोषी को उम्रकैद जैसी सख्त सजा नहीं दी जा सकती। यह सजा तभी दी जाएगी जब उसका अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी का हो।

यह कहते हुए सर्वोच्च अदालत ने दहेज हत्या में उम्रकैद की सजा पाए पुलिस के पूर्व सब इंस्पेक्टर को दी गई उम्रकैद की सजा को 10 वर्ष की कड़ी सजा में तब्दील कर दिया। दोषी नौ वर्ष से जेल में है और एक साल बाद वह जेल से बाहर आ जाएगा।

जस्टिस एफएम कलीफुल्ला और एएम सप्रे की पीठ ने शुक्रवार को दिए फैसले में कहा कि दहेज की मांग से तंग आकर आत्महत्या करने की धारा 304 बी में न्यूनतम सात वर्ष और अधिकतम उम्रकैद तक की सजा की प्रावधान है। लेकिन यह सजा साधारण तौर पर रूटीन में नहीं दी जानी चाहिए। यह सजा तभी दी जाए जब केस दुर्लभ किस्म का हो। इस मामले में दोषी काफी कम उम्र का है और यदि उसे 10 वर्ष की कड़ी सजा दी गई तो इसमें अन्याय नहीं होगा।

मामले के अनुसार दिल्ली  पुलिस में सब इंस्पेक्टर हरिओम ने विवाह में काफी दहेज मिलने के बाद और दहेज और रुपयों की मांग की। उसने यहां तक कहा कि यदि उसे फ्लैट खरीदने के लिए पैसे नहीं दिए गए तो वह पत्नी को घर में नहीं रखेगा। रोज रोज के विवाद से तंग आकर पत्नी मायके चली गई। लेकिन इससे बात नहीं सुसरालियों ने दहेज के लिए तंग करना जारी रखा। अंत में उसे जहर खाकर आत्महत्या कर ली। उसके सुसाइड नोट से पता लगा कि ससुराल वाले उसे दहेज के लिए तंग करते थे।

इस मामले में जींद सेशन कोर्ट ने हरिओम को उम्रकैद के साथ जुर्माना तथा उसके घरवालों को अन्य सजाएं सुनाई थीं। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने अपील पर हरिओम को छोड़कर सभी की सजाएं माफ कर दीं, लेकिन उसकी उम्रकैद बरकरार रखी। इस फैसले को उसने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

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