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बाग उचाड़ गए खिलने से पहले

पिछले एक दशक से इस समय तक हर साल यह एक बड़ा मुद्दा बन जाता है। संसद के हर सत्र की शुरुआत और अंत में विधायिका में महिला आरक्षण को एक बार जरूर याद कर लिया जाता है। कुछ इसे लेकर चीखते- चिल्लाते हैं, कुछ याचना करते हैं, कुछ कारण बताते हैं, कुछ तर्क देते हैं- सब के सब इस उम्मीद में कि इस बार जरूर हल निकलेगा। संसद और विधानसभाओं में औरतों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का रास्ता निकलेगा। लेकिन सिर्फ समय बीत रहा है। बहस जारी है, जो कहीं पहुंचती नहीं दिख रही। आरक्षण समर्थक कह रहे हैं कि प्रतिनिधि सदन में अगर औरतों को आरक्षण नहीं मिला, तो देश के कानून बनाने के काम और कई तरह के महत्वपूर्ण फैसले औरतों की सोच को शामिल किए बिना ही कर लिए जाएंगे। देश की राजनीति में पुरुषों का कब्जा पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा। लेकिन इसका विरोधी तर्क यह कहता है कि महा आरक्षण से ही औरतों का नजरिया फैसलों में नहीं पहुंच पाएगा। इसके जरिये विधायिका में पहुंचने वाली औरतें आमतौर पर प्रभावशाली पुरुष नेताओं की बीवी, बहू, बेटी या बहन ही होंगी। आरक्षण इन पुरुषों को राजनीति में अपने परिवार की औरतों को लाने का मौका देगा और किसी भी तरह से वे पुरुषों के नियंत्रण में ही काम करंगी। फिर एक तर्क यह भी है कि इस रास्ते से एलीट औरतें ही राजनीति में आएंगी। इसलिए अगर औरतों के लिए आरक्षण हो तो इसके कोटे को आगे जाति के आधार पर बांटना चाहिए। बहस एक दशक से जारी है और अब तक इसका फोकस कहीं खो गया है। इस बीच भारतीय राजनीति में कई चीजें बदल गई हैं, खासतौर पर देश की राजनीति के जातीय समीकरण। और एक दशक पहले के मुकाबले देखें, तो वामपंथियों समेत सभी दलों में औरतों की संख्या बढ़ी है। एक तरफ जयंती नटराजन जसी राजनीतिज्ञ हैं, जो वकील हैं और कांग्रेस की प्रवक्ता के रूप में सक्रिय हैं। और पूरी कामयाबी के साथ ऐसी ही भूमिका भारतीय जनता पार्टी में सुषमा स्वराज अदा कर रही हैं। और बृंदा करात तो वामपंथियों का सबसे ज्यादा नार आने वाले चेहरा हैं। यह ठीक है कि महिला मंत्रियों को अभी तक हल्के-फुल्के विभाग तक ही सीमित रखा जाता है। अभी तक किसी महिला ने गृह, रक्षा या किसी आर्थिक मंत्रालय की बागडोर नहीं संभाली है। हालांकि आज वित्तीय क्षेत्र में कई औरतें काफी ऊंचे स्तर पर काम कर रही हैं। इसके अलावा नौकरशाही में भी कई औरतें काफी ऊंचे स्तर पर गई हैं और उन्होंने पुरानी सीमाओं को तोड़ा है। इसलिए योग्यता और ज्ञान अब ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे लेकर औरतों के राजनीति में आगे बढ़ने का रास्ता रोका जा सके। एक और सच उन दस लाख औरतों के जरिये सामने आ रहा है, जो पंचायतों और नगर पालिकाओं में निर्वाचित होकर पहुंची हैं। हालांकि इसमें बहुत सी ऐसी हैं, जो अपने पिता या पति के प्रतिनिधि के रूप में ही काम करती हैं, लेकिन फिर भी कई ऐसी हैं, जिन्होंने अपने काम का लोहा भी मनवाया है। कुछ तो ऐसी भी हैं, जिन्होंने एक बार आरक्षण के जरिये रास्ता बनाने के बाद सामान्य सीट से भी चुनाव जीतकर दिखाया है। अब वे अपनी शैली से प्रशासन चलाती हैं। इस बात पर सैकड़ों अध्ययन हुए हैं और रपटें तैयार हुई हैं कि इन औरतों ने प्रशासन की गुणवत्ता को कैसे बदला है और स्थानीय प्रशासन में क्या बदलाव लाए हैं। क्या ये सार बदलाव सिर्फ स्थानीय प्रशासन के स्तर पर ही सीमित रह जाएंगे? क्या वे इस विश्वास को सही नहीं ठहराते हैं कि इस अनुभव को सत्ता के ऊं चे स्तरों पर भी आजमाया जाना चाहिए। अगर राज्य विधानसभाओं और संसद के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया, तो क्या इसका मौका आ पाएगा।ड्ढr भारतीय राजनीति का अनुभव यह कहता है कि औरतों के तब तक आगे आने की संभावना नहीं रहती है जब तक उनके पिता, पति, भाई, चाचा या किसी और रिश्तेदार को उनके राजनीति में आने से फायदा न दिखाई दे। इसका अर्थ हुआ कि राजनीति में कुछ औरतों को ही आगे आने का मौका मिलेगा और बाकी सब जहां जसी हैं, वहां वैसी ही रह जाएंगी। हालांकि, इसमें यह तर्क भी दिया जाता है कि जमीनी स्तर के अधिकतर पुरुष कार्यकर्ता भी जहां जसे हैं, वहीं वैसे ही रह जाते हैं। उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलता। इसलिए औरतों को ही आरक्षण क्यों दिया जाए? और इस सब को देखते हुए हम एक ही नतीजे पर पहुंचते हैं। अगर संसद और विधानसभाओं के लिए महिलाओं को आरक्षण उसी समय दे दिया जाता, जब पहली बार यह मसला सामने आया था, तब शायद आज हम यह दिखा पाने की स्थिति में होते कि औरतें राजनीति, नीतियों और प्रशासन पर क्या असर डाल सकती हैं। लेकिन अब मसले को इतने लंबे समय तक लटका दिया गया है कि इसके समर्थन और विरोध के तर्को की सारी ताकत शायद अब खत्म हो गई है।ड्ढr आरक्षण हो या न हो, लेकिन जरूरत इस बात की है कि हम इस सिलसिले में अपने नजरिये को पूरी तरह बदलें। अगर एक औरत या मर्द में काबलियत है तो उसे मौका मिलना ही चाहिए। कई देशों में औरतें सफलता के साथ रक्षा मंत्री का पद संभाल रही हैं। इसमें सबसे ताजा उदाहरण स्पेन का है। और उन्हें यह पद इसीलिए मिला है कि वे उतनी ही काबिल हैं, जितने कि उनके सहयोगी पुरुष। और सिर्फ इसीलिए कि वे औरत हैं, उन्हें इस पद को ग्रहण करने से नहीं रोका गया, क्योंकि परंपरागत रूप से यह पद पुरुषों के लिए ठीक माना जाता है। सिर्फ यही जरूरी नहीं है कि राजनीति में ज्यादा औरतें आएं। चाहे वे पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका की तरह आरक्षण से आएं, या फिर वे राजनीतिक दलों के विशेष प्रयासों से आगे बढ़ें, जसे कि ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने अपने आधार को व्यापक बनाने के लिए किया है। राजनीति में एक बार जब कोई औरत आ जाती है, तो वह उसी सूरत में आगे बढ़ पाती है, जब उनके सहकर्मी पुरुष उन्हें अपने बराबर माने। प्रशासन और नीति निर्माण में उनकी भूमिका बढ़ाने का यही एक रास्ता है। बदकिस्मती से सिर्फ कानून बना कर उनका नजरिये को नहीं बदला जा सकता।ड्ढr लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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