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जोखिम की जांच किए बगैर दी मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट में दावा किया गया है कि केन्द्र सरकार ने पर्यावरण पर प्रभाव, तूफान और सुनामी -ौसी आपदा प्रबंधन और जोखिम जसे मुद्दों पर विस्तृत रिपोर्ट के बगैर ही महत्वाकांक्षी सेतु समुद्रम परियोजना को आनन फानन में मंजूरी दी है। न्यायालय में दावा किया गया कि पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत अनिवार्य होने के बावजूद सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी देते समय उसके सात अनिवार्य बिन्दुओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति केाी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खण्डपीठ के समक्ष गुरुवार को तमिलनाडु के पर्यावरणविद् ओ. फर्नाण्डीा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पांचू ने दावा किया कि 270 किलोमीटर लम्बी इस परियोजना को अप्रत्याशित रूप से जल्दबाजी में मंजूरी दी गई। यह खण्डपीठ इस परियोजना की वैधानिकता को चुनौती देने और राम सेतु को बचाने के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं पर अब 6 मई को आगे विचार किया जाएगा। श्री पांचू ने कहा कि सरकार ने नीरी की त्वरित पर्यावरण प्रभाव रिपोर्ट के आधार पर ही दुनिया की इस अनोखी परियोजना को मंजूरी दे दी। उनका कहना था कि सरकार ने इस परियोजना के लिए तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य वन संरक्षण बोर्ड और वन्य जीव संरक्षण बोर्ड -ौसे विभागों की मंजूरी भी नहीं ली गई। भारतीय पुरातत्व सर्वैक्षण विभाग, रक्षा मंत्रालय, नौ सेना और विदेश मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र की भी कोई सूचना रिकार्ड पर नहीं है।

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