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धर्म की धारणा

धर्म का अर्थ है जो धारण करता है या जिसे धारण करके रखा गया है। जसे अग्नि का धर्म है जलाना! हर एक वस्तु का एक धर्म है और उसी के द्वारा उसका अस्तित्व सूचित होता है। अस्तित्व का निर्धारण किया जाता है और यदि वह धर्मच्युत हो जाता है तो उसका नाम-रूप ही बदलना पड़ता है। जसे, यदि आग जलाने की क्षमता खो बैठती है तो इसे आग कह कर नहीं पुकारा जाएगा। वह जो कार्य कर रही है उसी के आधार पर पुकारा जाएगा, आग नहीं। हर वस्तु का एक निर्दिष्ट धर्म है। इस कारण मनुष्य यदि कुछ करगा तो समाज-व्यवस्था, अर्थनैतिक व्यवस्था, साधना या जीवन में सब कुछ धर्म-सम्मत रूप में करना होगा। क्योंकि धर्म ही विधाता-निर्दिष्ट व्यवस्था है। हाथी का चेहरा एक प्रकार का है। वह अपना स्नान अपने शरीर के अनुरूप ही करगा। वह सूंड के द्वारा ही पानी खींच कर स्नान करगा, हाथ में पानी लेकर स्नान नहीं करगा।उसी तरह से मनुष्य को भी धर्मसम्मत रूप से कार्य करना होगा और चूंकि धर्म विधाता द्वारा निर्दिष्ट व्यवस्था है, अत: मनुष्य जो भी कार्य धर्मसम्मत रूप से करगा, वह उसके लिए कल्याणकारी होगा। उसमें उसकी जय निश्चित है। उसमें उसका कल्याण होगा और उसके इस स्वभाव को, उसके इस धर्मसम्मत स्वभाव की जो भी विरोधिता करगा, उसका ध्वंस हो जाएगा। जसे ईश्वरोपासना और सम्मानपूर्वक जीने ओर रहने का अधिकार मनुष्य की धर्मसम्मत व्यवस्था है। इस प्रकार की धर्मसम्मत व्यवस्था में यदि कोई बाधा खड़ी करगा, विरोध करगा तो उसे ध्वंस होना ही पड़ेगा। क्योंकि धर्म का विरोध करके कभी भी कोई न विजयी हुआ है और न होगा। इस कारण जब भी तुम लोग अपनी शक्ित के द्वारा चलोगे, दृढ़ पदविक्षेपण से चलोगे, सिर ऊंचा करके चलोगे, कारण याद रखोगे, जब धर्म तुम्हार साथ होगा तो वह जो तुम्हार विरुद्ध जाएगा उसका पतन अनिवार्य है।

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