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20 अक्तूबर, 2020|5:01|IST

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और भी ठिकानों पर है काली कमाई

अपने यहां पंचतंत्र की कथा की तरह कालेधन से संबंधित सूचनाओं की शाखाएं उग आई हैं, जिन्हें लेकर आने वाले दिन मुश्किल भरे होंगे कि सरकार किन-किन देशों से उन भारतीय खातेदारों के बारे में जानकारी एकत्रित करे, जिनकी अकूत संपत्ति स्विट्जरलैंड के अलावा दुनिया के दूसरे देशों में खपाई जा चुकी है। हम स्विट्जरलैंड में सांप की लकीर पीटने में लगे हुए हैं, जबकि वहां से कई गुना अधिक काला धन दुनिया के दूसरे ठिकानों पर भारतीय धन्ना सेठ, नेता और नौकरशाह सरका चुके हैं। वित्त मंत्रालय में एक महकमा है, ‘फॉरेन टैक्स ऐंड टैक्स रिसर्च (एफटीऐंडटीआर)। पिछले दो वर्षों से ‘एफटीऐंडटीआर’ के अफसर सिंगापुर, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, केमैन आइलैंड जैसी सरकारों से 505 भारतीय खातेदारों का ब्योरा मांग रहे हैं, जिनके काले धन इन देशों में जमा हैं। लेकिन अब तक इसमें कोई सफलता नहीं मिली है। इन 505 धनपतियों में मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, सूरत, बडोदरा, चेन्नई, बेंगलुरु, कोलकाता, हैदराबाद जैसे ठिकानों के लोग हैं, जिनके बारे में अंदाजा है कि इनमें से कई के खाते स्विस बैंकों में थे, जहां से काफी सारा पैसा वे निकाल चुके हैं।
 
इस समय दुनिया भर में 70 से अधिक देश हैं, जो काले धन जमा करते हैं, जिन्हें ‘टैक्स हैवन’ कहा जाता है। इन्हें स्विट्जरलैंड के उस अध्यादेश से प्रेरणा मिली थी, जिसके आधार पर ब्लैक मनी जमा करने वाले 20 प्रतिशत तक कर देकर अपना काला धन सफेद कर सकते थे। लक्जमबर्ग, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, केमैन आइलैंड, बरमूडा, नीदरलैंड, समोआ, सिसली, मोनाको ऐसे छोटे-छोटे देश हैं, जहां के बैंकों में आप चाहे जितना धन जमा कर लें, उन पर ‘जीरो टैक्स’ है। मतलब, आपको कोई कर नहीं देना है। इनके अलावा मॉरिशस, हांगकांग, सिंगापुर, सऊदी अरब ऐसे ठिकाने हैं, जहां आपका धन द्वीप खरीदने से लेकर सोने और कच्चे तेल के कारोबार में सुरक्षित है। अमेरिका स्थित खोजी पत्रकारों का संगठन इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जनर्लिस्ट (आईसीआईजे) का आकलन है कि पिछले तीन दशक में एक लाख बेनामी कंपनियां, ट्रस्ट, एनजीओ, समाजसेवी संस्थाएं भारत से बाहर दुनिया के 60-65 मुल्कों में काला धन सुरक्षित कर चुकी हैं, जिन्हें वापस लाना किसी एक सरकार के बस की बात नहीं है।

कालेधन की आवाजाही पर नजर रखने वाली एक और संस्था ‘ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी’ ने 1948 से 2008 तक का आकलन किया था, जिसके अनुसार भारत से बाहर इस अवधि में 462 अरब डॉलर निकाले जा चुके हैं। ज्यादातर पैसे हवाला के माध्यम से इस देश से निकाले गए। इसका मतलब यह हुआ कि भारत में हवाला कारोबार लंबे समय से फल-फूल रहा है, लेकिन सरकारें इनके आगे बेबस रही हैं। यह एक यक्ष प्रश्न की तरह  है कि मार्च 1998 से लेकर मई 2004 तक वाजपेयी सरकार के समय जो धन देश से बाहर गया, उसका ब्योरा वित्त मंत्री अरुण जेटली किस तरह से उपलब्ध कराएंगे? मोदी सरकार यह क्लीन चिट नहीं दे सकती कि 1998 से 2004 तक भारत से बाहर एक फूटी कौड़ी नहीं गई।
 
यह तय मानिए कि काले धन के सभी 800 खातेदारों के नाम उछलते ही देश की राजनीति में एक बड़ा तूफान खड़ा होगा। राजनीतिक दल एक-दूसरे के कपड़े फाड़ेंगे, और उन्हें चंदा देने वाले अदृश्य हाथ धमकाएंगे। प्रश्न यह है कि यदि किसी भारतीय ने अपने पूरे ब्योरे के साथ स्विस बैंकों में खाता खोल रखा है, और भारत सरकार को कर अदा नहीं किया है, तो क्या उस धन को जब्त कर भारत लाया जा सकता है? एसोचैम जैसी संस्था अब भी नहीं चाहती कि काले धन वाले धनपतियों के नाम सार्वजनिक हों। यदि ऐसा होता है, तो इंडस्ट्री बनाम सरकार का मोर्चा खुलना संभव है। भारत सरकार काले धन वालों को पकड़ने के लिए डबल टैक्सेशन अव्यॉएड एग्रीमेंट (डीटीएए) को भी एक कारगर हथियार मानती है। पर यह कहने भर को ‘कारगर हथियार’ है। जिस तरह से वित्त मंत्रालय का महकमा ‘फॉरेन टैक्स ऐंड टैक्स रिसर्च (एफटीऐंडटीआर), पिछले दो वर्षों से ऑफ शोर (दूरवर्ती) अकाउंट्स की सूचनाओं के लिए दर-दर भटकता रहा, वह पिछली संप्रग सरकार के असहाय होने का सबसे बड़ा उदाहरण है।

भारत सरकार ने 88 देशों से ‘डीटीएए’ समझौते किए हैं, जिनमें से एक स्विट्जरलैंड भी है। ‘डीटीएए’ समझौते के तहत यदि किसी स्विस नागरिक का शेयर भारत की कंपनियों को ट्रांसफर होता है, तो उससे होने वाले पूंजी लाभ (कैपिटल गेन) पर भारत सरकार कर लगा सकती है। यही कराधान व्यवस्था स्विट्जरलैंड में भारतीय निवेशकों के साथ लागू होती है। ऐसे में, क्या स्विट्जरलैंड इसकी अनुमति देगा कि भारतीय खाताधारकों के पैसे भारत सरकार वापस मंगा ले? यदि ऐसा हुआ, तो स्विस बैंकिंग व्यवस्था ही बर्बाद हो जाएगी, और पूरी दुनिया के खातेधारकों का उस पर से भरोसा उठ जाएगा। ‘डीटीएए’ में यह भी संकल्प किया गया है कि खाताधारकों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे। लेकिन मोदी सरकार पर नाम सार्वजनिक करने का जबरदस्त दबाव है। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे भाजपा नेता मांग करने लगे हैं कि नाम उजागर किए जाएं। वित्त मंत्री अरुण जेटली यह बयान देते हैं कि अदालत में नाम जाते ही यह सार्वजनिक हो जाएगा।  ‘डीटीएए’ का अनुच्छेद-26 अदालत और जांच अधिकारी तक सूचनाओं को सीमित करता है। यदि अदालत के बहाने नाम उजागर किए जाते हैं, तो संभव है कि बाकी 87 देश ‘डीटीएए’ को मानने से पीछे हट जाएं। लेकिन क्या नाम उजागर कर देने से स्विट्जरलैंड से काला धन आ जाएगा? फिर उन बेनामी, अथाह काले धन का क्या होगा, जो दुनिया के 65-70 मुल्कों में भारतीय ने दफन कर रखा है?

भारत को काले धन के बारे में दो अलग-अलग सूचनाओं के लिए जर्मनी और फ्रांस की सरकारों को कितने करोड़ यूरो देने पड़े, इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। संभव है, बैंक सीडी की दलाली में अपने यहां कुछ लोगों ने हाथ साफ किए हों। जर्मनी पूरी दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है। उसके राजनीतिक हलकों में इस ‘चोरी का माल खरीदने और फिर बेचने’ के प्रश्न पर जमकर प्रतिरोध हुआ। चांसलर एंजेला मर्केल की सरकार को समर्थन देने वाली क्रिश्चियन डेमोके्रटिक यूनियन (सीडीयू) के नेता मोर्लंरग ने बयान दिया कि सरकार चोरी वाले डाटा खरीदने को बाध्य थी, पर उन्हीं की पार्टी के संसदीय दल के नेता काउडर ने कहा कि चोरी तो चोरी है, सरकार का काम यह नहीं है कि वह चोरों के साथ मिलकर व्यापार करे। स्विस बैंकर एसोसिएशन और स्विस प्राइवेट बैंकर एसोसिएशन ने बयान दिया कि ऐसा चौर्यकर्म करके जर्मन सरकार ने सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। तो क्या अपने यहां मर्यादाओं का हनन नहीं हुआ है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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