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अगलगी से तबाह पीटीपीएस

पतरातू थर्मल पावर स्टेशन अगलगी की घटनाओं से भी तबाह है। छोटी-मोटी घटनाएं तो कई बार हुईं, लेकिन झारखंड बनने के बाद 1ानवरी 2002 और दूसरी बार 10 अगस्त 2006 में लगी आग ने प्लांट को तबाह कर दिया। 2006 में लगी आग पीटीपीएस के अब तक की अगलगी के इतिहास की सबसे बड़ी घटना बतायी गयी। इस अगलगी में प्लांट की यूनिट संख्या नौ और दस दोनों बुरी तरह जलकर स्वाहा हो गये। वर्ष 2002 में लगी आग से यूनिट एक और दो जल गये थे। ये आग किसी ने लगायी या अपने से लगी, इसकी जांच रिपोर्ट महीनों बीत जाने के बाद भी नहीं आयी है।ड्ढr 2006 की अगलगी से शुरू में सिर्फ 40 से 50 करोड़ रुपये की बर्बादी का आंकलन किया गया था। लेकिन जली हुई यूनिटों का तीन बार वैल्यूएशन कराया गया, तो यह आंकड़ा दो सौ करोड़ को पार कर गया। भेल के साथ इन प्लांटों की मरम्मत के लिए एग्रीमेंट किया गया है। एग्रीमेंट के मुताबिक 220 करोड़ रुपये में यह काम पूरा होगा। यह राशि आगे बढ़ भी सकती है। इन यूनिटों की अगलगी की घटना के मामले में झारखंड बिजली बोर्ड और पीटीपीएस मैनेजमेंट ने मानवीय भूल की बात स्वीकारी थी। 20 महीने बीत जाने के बाद भी इसकी जांच का कोई रिाल्ट सामने नहीं आया।ड्ढr पीटीपीएस की चालू इकाइयों में ट्यूब लीक, एयर लीक तथा हाइड्रोन लीक होनो और ब्यॉलर फटने जसी घटनाओं के साथ-साथ छोटी-मोटी अगलगी की घटनाएं तो आम बात हो गयी हैं। किसी भी चालू इकाई के संबंध में पीटीपीएस का कोई साधारण अभियंता, मुख्य अभियंता या जीएम तक नहीं बता सकता कि कौन इकाई लगातार 12 घंटे तक चलेगी या 72 घंटे तक। इसके पीछे का कारण पहले ही बताया गया है-कैपिटेल मेंटेनेंस का नहीं होना। वैसे पीटीपीएस में होनेवाली अगलगी की घटनाओं के पीछ षडयंत्र भी बताया जाता है। अभी तक अगलगी की जांच रिपोर्ट नहीं आयी है और इसकी उम्मीद भी कम है। आम लोगों की नजर में पीटीपीएस के आला अधिकारी और ठेकेदार गठाोड़ भी कई कहानियों को जन्म देता है।

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