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अमर्यादित प्रतिनिधि

हमारे प्रतिनिधि संसद और विधानसभाओं में कैसा बर्ताव करते हैं इसे जानने के लिए हमें सोमनाथ चटर्ाी के इंगित की जरूरत नहीं है। प्रतिनिधियों के आचरण की असलियत तो सदन की कार्यवाही के टेलीविजन प्रसारण के बहुत पहले ही जगजाहिर थी। इसलिए लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्ाी सोमवार को जब सांसदों के अमर्यादित आचरण पर क्षोभ जाहिर कर रहे थे तो वे लोगों की उसी भावना को ही स्वर दे रहे थे, जिसके लिए राजनीतिज्ञ अब सम्मान के पात्र नहीं रह गए हैं। और बात सिर्फ आम जन भावना की ही नहीं है। संसद को हमने संवाद के ऐसे सर्वोच्च मंच के रूप में स्थापित किया है, जो अपनी बहस और विचार-विमर्श से देश को नीतियां और नियम-कायदे देगा। संवाद, बहस, विचार-विमर्श और निर्णय इसके आधार हैं। लेकिन संसद और विधानसभाओं से आने वाली खबरों में हुल्लड़, नारबाजी, कामरोको ही ज्यादा दिखाई देता है। संसदीय प्रणाली में विरोध का सबसे बड़ा हथियार तर्क होते हैं, लेकिनअब उनके बजाय हंगामे का इस्तेमाल ही ज्यादा हो रहा है। ऊंचे स्तर की संसदीय परंपरा कायम करने के लक्ष्य अब इन्हीं हंगामों में बदल कर रह गए हैं। यह इस या उस राजनीतिक दल की बात नहीं है, क्योंकि पिछले कुछ साल में तकरीबन सभी दलों के समय-समय पर सत्ता या विपक्ष के कुछ न कुछ समीकरण रहे हैं। दोनों ही जगहों पर सबका बर्ताव एक सा ही रहा है। मसला गंभीर इसलिए है कि संसद अगर अपने लक्ष्य से भटकी तो लोकतंत्र का स्तर भी डगमगाएगा ही। खेद की बात है कि अब जब लोकसभा अध्यक्ष इसे दुरुस्त करने के लिए कुछ सक्रिय दिख रहे हैं तो उनकी सक्रियता को भी दलगत राजनीति की नजर से ही देखा जा रहा है। हालांकि एक बार जब सदन किसी को अध्यक्ष बना देता है, तो माना यही जाता है कि वह न तो दलगत नजरिये से कोई फैसला करगा और न ही उनके फैसले पर इस तरह की उंगलियां उठाई जाएंगी। सोमनाथ चटर्ाी पहले भी ऐसे आरोपों से दो-चार हो चुके हैं। इसलिए इस बार उन्होंने पूरी सावधानी बरती है और संसदीय मर्यादा का उल्लंघन करने वाले 32 सांसदों के खिलाफ खुद कार्रवाई करने के बजाय मामले को विशेषाधिकार समिति के हवाले कर दिया है। दरअसल अब वह वक्त है जब एक सर्वदलीय समिति बनाकर संसदीय आचरण कीड्ढr मर्यादाएं और उसके उल्लंघन की सजा तय कर दी जाए।

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