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कोई नहीं बता सकता आपका भविष्य

न आपकी उम्र को और न दिल-दिमाग या पैसे, बच्चे वगैरह। कुल मिलाकर उसका कोई मतलब नहीं। फिर अंकगणित, टैरो कार्ड, भृगु संहिता या सौ साखी का भी वही हाल है। ये सब पूरी तरह फर्ाी हैं। मैं तो अब सोचने को मजबूर हो गया हूं कि जो लोग उन्हें गंभीरता से लेते हैं, वे कहीं दिमागी दिवालिये तो नहीं। हालांकि कुछ लोगों ने तो समाज में काफी ऊंचाई हासिल की। मसलन, मुरली मनोहर जोशी, जयललिता या टी. एन. शेषन वगैरह। अपने यहां के अच्छे-खासे समझदार लोग शुभ मुहूर्त के लिए ज्योतिषियों की शरण में चले जाते हैं। उनमें कॉमरड भी शामिल हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि 0 फीसदी हिन्दुस्तानी किसी न किसी किस्म की भविष्यवाणी में यकीन करते हैं। शायद इसीलिए मुझे कलाम साहब के बार में जानकर अच्छा लगा था कि उन्हें इस सब पर यकीन नहीं है। उन्होंने अपनी शपथ के लिए कोई शुभ मुहूर्त नहीं ढूंढ़ा था। लेकिन मुझे यह जानकर निराशा हुई कि हमारी महिला राष्ट्रपति का जयपुर की एस्ट्रोलॉजिकल सोसाइटी ने स्वागत किया। आखिर वह उसकी एक पैट्रन थीं। मैं तो ज्योतिष में भरोसा करने वाले किसी भी शख्स से शर्त लगाने को तैयार हूं। वे चाहे जितने की शर्त लगा लें। वे सिर्फ यह बता दें कि अगले दिन उनके या मेर साथ क्या होने वाला है? अगर उनकी बात सही हो गई, तो मैं हमेशा के लिए उनके खिलाफ मुंह बंद कर लूंगा। लेकिन अगर वे अपना अगला दिन भी नहीं बता पाए तो उन्हें अपनी हार मान लेनी चाहिए। उन्हें मान लेना चाहिए कि वे किसी के कल को नहीं बता सकते। बहादुरशाह जफरड्ढr अगर आपसे हिन्दुस्तानी इतिहास से एक हीरो चुनने को कहा जाए तो किसे चुनेंगे? यह सचमुच मुश्किल सवाल है। कई नाम एकसाथ आपके जेहन में चले आते हैं। इस मसले पर सलमान खुर्शीद को कोई शक नहीं है। उनकी पसंद के मायने हैं। वह हमार बड़े नेता हैं। सेंट स्टीफंस और ऑक्सफोर्ड में पढ़े हैं। काबीना मंत्री रहे हैं। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के दो बार मुखिया रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील और दिल्ली पब्लिक स्कूल सोसाइटी के चेयरमैन हैं। फिर लिखते-पढ़ते तो हैं ही। सलमान की पसंद बहादुरशाह जफर हैं। आखिरी मुगल बादशाह और अजीम शायर। अपनी बात कहने के लिए उन्होंने एक नाटक लिखा है। रूपा से आया वह नाटक है, ‘सन्स ऑफ बाबर: अ प्ले इन सर्च ऑफ इंडिया।’ नाटक की शुरुआत दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र चुनावों से होती है। कम्युनिस्ट और हिन्दू फासीवादी छात्रों के बीच जोरदार टक्कर हो रही है।हिन्दुत्ववादी जय श्रीराम, हिन्दू राष्ट्र की जय वगैरह नार लगा रहे हैं। दूसरी ओर एक छोटा सा इतिहास पढ़नेवालों का ग्रुप है उसमें हिन्दू, मुसलमान और एंग्लो इंडियन लड़की है। वह गंभीरता से इस बहस में लगे हैं कि हिन्दुस्तानी होने के क्या मायने हैं? कौन सी ऐसी चीज है, जो उन्हें एक होने का एहसास कराती है। लेखक फैंटेसी में बहादुरशाह जफर तक पहुंचते हैं। रंगून के उनके आखिरी दिनों में उनसे लंबी गुफ्तगू होती है। बहादुरशाह के जरिए बाबर से औरंगजेब तक चले आते हैं। हर कोई अपनी बात रखता है कि उसने खास मौके पर वैसा ही क्यों किया? भाईयों की हत्या, पिता को कैद वगैरह-वगैरह। उनके चक्कर में जो पीड़ित हुए उनके बार में कुछ नहीं है। अपने अहम किरदार के जरिए जफर को लेकर अपनी पसंद जाहिर करते हैं सलमान। ‘मैं हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियत के विचार को दिलचस्प मानता हूं। अपने इतिहास की कई शख्सीयतें और घटनाएं इस पर रोशनी डाल सकती हैं। लेकिन जफर के मायने ही अलग हैं। हमार राष्ट्रवाद के लिए 1857 की अलग हैसियत है। और जफर की जिंदगी की भी।’ जफर के साथ अपनी आखिरी मुलाकात के लिए वे ऐंग्लो इंडियन लड़की को भी ले जाते हैं। वह उनकी एक मशहूर नज्म गाती है। लेकिन उसमें किसी रोमांस का हिंट भी नहीं है। सचमुच। मैं नहीं जानता कि सलमान के इस नाटक को खेला भी जा सकता है या नहीं। उसमें बहादुरशाह के कई बयान हैं जिनमें वह अपनी सफाई दे रहे हैं। शायद इब्राहिम अल्काजी किस्म का जीनियस उस पर कोई नाटक कर पाए। उस पर बेहतर फिल्म भी बन सकती है। अगर महेश भट्ट उसे हाथ में लें तो। कुछ भी हो बेहतर लिखा है सलमान ने।

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