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सिंहासन बत्तीसी कथा, वाया 14 वीं लोकसभा

पहली मई को लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्ाी ने देश के इतिहास में पहली बार एक अभूतपूर्व फैसले की तहत (24 अप्रैल को) महँगाई पर छिड़ी बहस के दौरान संसद की कार्रवाई में बार-बार व्यवधान डालने वाले बत्तीस सांसदों के खिलाफ एक सख्त अनुशासनात्मक कदम उठाया है। लोकसभा की पन्द्रह सदस्यों वाली विशेषाधिकार समिति को इस बाबत बाकायदा नोटिस भी जारी कर दिया गया है। विशेषाधिकार समिति एक अदालत की तरह पूर प्रकरण की अब जॉंच के बाद अगर मान्य सांसदों को दोषी पाएगी तो वह दोषी सांसदों का चेतावनी-भर्त्सना से लेकर सीधे वेतन रोकने अथवा संसद से उनके निलंबन अथवा बर्खास्तगी तक के दण्ड की सिफारिश कर सकती है। अंतिम फैसला लोकसभा करगी। वर्तमान (बजट) सत्र में लोकसभा सदस्यों की अनुशासनहीनता के चलते 11 बार स्थगित हो चुकी है, और जानकारों की राय है, कि 7 दिसंबर,2007 तक हुए हंगामे में बर्बाद समय की कीमत 57 करोड़ रुपए से भी अधिक ठहरती है। लोकसभाध्यक्ष इससे पहले भी सदस्यों की अनुशासनहीनता से व्यथित होकर एकाधिक बार कह चुके हैं कि लगता है कुछ सांसद संसदीय लोकतंत्र के खात्मे के लिए ओवरटाइम काम कर रहे हैं। और टेलीविजन के पर्दे पर पूर देश ने भी देखा है कि चौदहवीं लोकसभा में जनता से जुड़े सवालों की बहस के वक्त या तो कुछ सांसदों ने सार्थक बहस होने में बार-बार बाधा डाल कर ठीकठाक बहस नहीं होने दी, या फिर जरूरी मौकों पर (ौसे महँगाई मुद्दे पर हुई बहस के दौरान) उनकी बड़ी तादाद में गैरहाजिरी से सदन का कोरम पूरा करना भी कठिन हो गया। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने भी माना है, कि राजनीतिक मुद्दों पर गंभीर और गहरी बहसें आज मीडिया में हो रही हैं, पर संसद में जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच नहीं। सिर्फ विधायिका के लिए ही नहीं, लोकतंत्र के सभी अन्य पायों के लिए भी 14वीं लोकसभा के लिए जनप्रतिनिधियों को चुनने वाली जनता जिसने कि अभी भी अपना अनुपात-बोध पूरी तरह नहीं गॅंवा दिया है, महिलाओं के लिए विधायिका में आरक्षण पर, आरक्षण व्यवस्था में मलाईदार पर्त पर, श्रम कानूनों में सुधार पर कई गंभीर बहसें तथा फैसले बजट सत्र में होने की भारी उम्मीद पाले हुए थी। उसे निराशा ही हाथ लगी है। उधर संविधान के सर्वोच्च सेंसर उच्चतम न्यायालय ने भी (टी.वी.स्टिंग आपरशन में रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद सदस्यता खो चुके सांसदों की अपील के संदर्भ में) पहले ही साफ कह दिया है, कि संसद सर्वोच्च है और सदन की मर्यादा को बनाए रखने के लिए सदस्यों की बर्खास्तगी या सदस्यता समाप्ति का हक उसे है, न्यायपालिका को नहीं।ड्ढr खबरों के अनुसार, सांसद शाहनवाज हुसैन ने कहा, कि जनता ने सांसदों को संसद में बुत बन कर बैठने के लिए थोड़े ही ना भेजा है, लिहाजा महॅंगाई पर सांसदों का आवाज बुलंद कर सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ बोलना गुनाह क्योंकर माना जाए? लोकसभाध्यक्ष पर एक महीन कशाघात करते हुए वे यह भी कह गए कि जब वे स्वयं युवा सांसद के रूप में (1में) संसद पहुॅंचे थे, तो उन्होंने बतौर वरिष्ठ सांसद सोमनाथ चटर्ाी को भी जोरदार ढंग से वहॉं मुद्दे उठाते सुना, और उन्हीं जसों से आवाज बुलंद करना सीखा है। विजय कुमार मल्होत्रा ने याद दिलाया कि सोमनाथ चटर्ाी समेत कम्युनिस्ट, जब विपक्ष में थे तो वे भी तो प्रतिरोध में खूब आवाजें उठाते थे। स्पीकर के आसन तक भी आ जाते थे। पर तब स्पीकर ने ऐसा कदम नहीं उठाया, फिर अब क्यों? विपक्षी सांसदों को सदन में गरीबों के मुद्दों पर एक निरंकुश सरकार के खिलाफ बुलंद आवाज उठाने का पूरा हक है। पर सवाल यह नहीं, बल्कि यह है, कि देश के सर्वोच्च सदन में लोकतांत्रिक बहस की नेहरू से लोहिया तक पुरानी पीढ़ी द्वारा स्थापित उन मर्यादाओं की क्या आज के सांसदों को परवाह है, जिनकी मार्फत विगत में जनहित के मुद्दों पर सार्थक, तर्कसंगत और स्मरणीय बहसें संसद में कराई गई हैं? अगर सांसद जनता के पक्ष में आवाज उठाने के प्रबल पक्षधर हैं, तो वे जनता के आगे तर्कसंगत मुद्दों को चरणबद्ध तरीके से उभारने वाली बहसें होने देने में बाधक क्यों बनते हैं? खुद लोकसभाध्यक्ष ने यह कई बार कहा है, कि मीडिया में लोकसभा की कार्रवाई को समुचित स्थान या महत्व नहीं मिलता। पर लोकसभा कार्रवाई से यदि उनका आशय गंभीर, तर्कसंगत और दिमाग को रोशन करने वाली बहसों से है, तो सुधी पाठक दिमाग दौड़ाएं, महॅंगाई, ग्लोबल वार्मिग, विदेशनीति अथवा आरक्षण जसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर क्या उन्हें इस सत्र की कोई मार्मिक और देश को हिलाने वाली तहरीर अथवा बहस याद आती है? संसद अथवा विधानसभाओं में चुन कर आए सभी लोग सदैव दूरदर्शी, युगद्रष्टा किस्म के नहीं होते। लेकिन बहस से हुल्लड़ को, और गर्मागर्म तर्क-प्रतितर्क की बजाय बहिर्गमन को ज्यादा वजनदार मानने के फामरूले से सभी जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को परहेा होना चाहिए। यदि भाजपा लोकसभाध्यक्ष के फैसले के इस विरोध के प्रति ईमानदार है तो कहना होगा, कि यह अदूरदर्शिता की हद है। और अगर वह ईमानदार नहीं है, तो कहना होगा कि किसी भी पार्टी के लिए यह सचमुच खुराफात की आखिरी हद है। इस वक्त, जब गंभीर और विश्वव्यापी पर्यावरण क्षरण और अन्न-ाल संकट के मुद्दे देश के आगे मुॅंहबाए खड़े हैं, देश की संसद को उन सांसदों की जरूरत है, जो अपनी तमाम दलगत विभाजक रखाएँ भुला कर पूर देश के बार में सोचें और बोलें। अगर वे दक्षिण भारतीय हों, तो उत्तर भारत की गरीबी और बदहाली पर कटाक्ष करने से बाज आएॅं, उत्तर भारतीय हों, तो रामसेतु पर दक्षिण भारतीय सांसदों का पक्ष भी पूरी संवेदना से समझें, पुरुष हों, तो स्त्रियों के खिलाफ हिंसा और उनके राजनीति से लेकर घर तक हाशिए पर रखे जाने की सचमुच चिंता करं और अगर पिछड़े हों, तो मलाईदार परत के बार में ईमानदार स्टैण्ड लें। इसका मतलब यह कतई नहीं, कि बढ़ती महॅंगाई और किसानों की आत्महत्या जसे मुद्दों पर हम विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष की तर्कसंगत और सतत आलोचना का महत्व कम करके ऑंक रहे हैं। लेकिन प्रबुद्ध सांसदों की रुचि तो ऐसी बहसों में होनी चाहिए जो अपने दलगत हित खण्डित सत्य की बजाय राष्ट्र के सत्य को सम्पूर्णता से देखें और व्यक्त करें। वर्ना राष्ट्रीय सत्य का प्रवक्ता और आदर्श मंच कौन और कहाँ और कैसे बनेगा? निगोड़ी संप्रग को जल्द से जल्द सत्ता से हटा कर राजसिंहासन पर जनहित में उसकी जगह लेने को आतुर विपक्ष सटीक बहसों के आधार पर सम्पूर्ण सत्य (उसका तात्कालिक बिंदु कर्नाटक में हो अथवा नंदीग्राम में) को समझने और उसके फलादेश की साफ विवेचना सुनना अपेक्षया गैरारूरी मान रहा है। वह चाहता है कि विपक्ष के टूटे (या एक लेंस वाले) चश्मे से ही हर मुद्दे को देखा जाए और अगर सरकार किसी मुद्दे को समर्थन दे रही है तो गलाफाड़ विरोध हो, क्योंकि विपक्ष यही करता आया है। यह एक बचकानी अवयस्क धारणा है। और ऐसे दर्शन के शिखर पर बैठी पार्टियों के सत्ता में आने के बाद मीडिया ही नहीं, जनता भी उनसे राष्ट्र स्तर पर जनहितकारी कदमों की उम्मीद कैसे करगी?ं

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