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बिल्लो रानी की आत्मकथा

‘आत्मकथा’ को क्या ‘आइटमकथा’ कहा जा सकता है? बिल्कुल कहा जा सकता है। कहने वाले ता कहते हैं कि ‘आत्मकथा’ पद मूलत: ‘आइटम कथा’ से बना है । दोनों के बोलने-बरतने में मुख-सुख है। पद मैत्री भी है। कुछ विद्वानों का विनम्र अभिमत है कि जिस गीत ने ‘आत्मकथा’ को ‘आइटमविध’ का अवतार दिया उस गीत की महिमा अनंत है। यहां इस ‘आइटमकथा’ के बारे में जा कुछ कहा गया है उसे ‘थोड़े कहे को बहुत समझना जी’ की शैलीमें ही समझें। ‘बिल्लो रानी कहो तो मैं जान दे दूं’ नामक आइटम ठुमका गीत जिस कवि ने लिखा वह ग्रेट है। उसकी कलम ग्रेट है। ‘गोल’ फिल्म ग्रेट है क्योंकि अपनी बिल्लो रानी गेट्र है। यह गाना एक साहित्यिक गोल है। यही इसका साहित्यिक महत्व है। यह इस आत्महीन युग में बिल्लो रानी की ‘आत्मकथा’ कहता है। आत्मा का गीत है जो आत्मा ने बेहद कम कपडों में मुए ढेर मजनुंओं के बीच गाया है। यह बिल्लो रानी के साहस की गाथा कहता है। बिल्लो रानी की आत्म कथा समकालीन हिंदी प्रदेश की आत्मकथा की तरह है। बिल्लो रानी की साहित्यिक यात्रा बहुत पहले शुरू हुई । वह भी एक महागीत के रूप में हुई।तब देश में बिल्लो रानी के ‘जिगर मां बड़ी आग थी’ : ‘बीड़ी जलाइले जिगर से पिया, जिगर में मां बड़ी आग है।’ साहित्यिक रसिए इस गान के जरिए अपनी-अपनी साहित्यिक बीड़ियां जलान को बेताब होने लगे। आलाचकों ने इसे फिल्मी समझा और नाचने लगे जबकि यह गाना इल्मी था। इसकी घनघोर साहित्यिक सार्थकता थी । यह किसी-किसी ने ही जाना। जिन्होंने जाना उनमें बिल्लो रानी के संग अक्सर नाचने-गाने वाला एक बिल्लो राजा था, जिसने जाना। फिर उसके कुछ पिल्ले राजाओं ने भी जाना और इस तरह गाना दोस्तर पर अर्थ देता रहा : फिल्मी और इल्मी। फिल्मी जगत के रसियों के बीच बिल्लो बीड़ी जिगर की आग से जलान की बात करती रही, क्योंकि साहित्यिक ठंड में हीटर के बिना यही संभव था। असली गांव जाड़े की रात और बीड़ी जलान की समस्या! यह समूची रचनाप्रक्रिया ही थी, जिससे बिल्लो रानी ने साहित्यिक दुनिया में पहला ठुमका लगाया और रातोंरात हिट हो गई। सारे बिल्ले और पिल्ले लाइन में लग लिए। गाना हिट कर दिया गया गांव की माटी की महक और देसी तर्ज की लहक और स्त्राी की दर्दभरी चहक को बार-बार पढ़ा-गुना गया और इतिहास हो गई बिल्लो रानी। जिन दिनों सेनसेक्स पतनशील हुआ नीच की ओर लुढ़क रहा था। अमरीकी सब प्राइम रेट संभाले नही संभल रहा था। ओबामा और हिलेरी के बीच बहसें उठ गिर रही थीं और महंगाई साढे सात फीसदी का आंकडा पार करती दिख रही थी जिस समय आडवाणी जी ने अपनी जीवनी लिखी जिसकी कुछ भूलों को बाद में सुधारा जाता रहा। जिस कठिन समय में भारत में आए दिन चुनाव चरचाएं गरम होने लगीं और जिस वक्त तीन-चार मोरचे मुकाबल के लिए कमर कस रहे थे उस वक्त के आसपास बिल्लो रानी का गाना हिट हुआ। यह संयोग मात्र ही था कि उस पर समीक्षकों की नजर पड़ी। वे समीक्षाएं रहें। उन्हें एक गाने में एक उपन्यास एक महाकाव्य महसूस होने लगा और तभी उस पर नहले पर दहल की तरह बिल्लो रानी ने अपनी आत्मकथा ही एक नए गाने में पिरो डाली :‘बिल्लो रानी कहो तो मैं जान दे दूं’ का संदर्भ और प्रसंग यही है जिसे जाने बिना आप आइटमकथा का मर्म और उसकी टर्म के बारीक धग को तोड़ सकते हैं और रचना के प्रति अपराध् कर सकते हैं. गान की एक एक लाइन अवधानतापूर्वक पाठ मांगती है। पहले बिल्ले राजा कहता है : ‘भूल गया अपना भी नाम जब तेरा नाम इतिहास हुआ’ इस के आसपास बिल्लो लहराने लगती है। यह उसकी आत्मा का विमर्श है जिसे एक मर्द करता है। इसके बाद बिल्लो मर्दवाद को डिपफाइन करती है। यहां एसका भावार्थ जैसा दिया जा रहा है : ‘मैं इनको क्या समझूं? ये तो सब मजनूं हैं। ये तो किसी न किसी पर फिदा होते रहते हैं। ये सब मजनूं आगे पीटे गली नुक्कड़ पर टेडते ही रहते हैं। उनकी बातों में नही आना है जमाना देखा है। और फिर बिल्ले राजा पास आकर कहने लगता है : बिल्लो रानी कहे तो अपनी जान दे दूं। बिल्लो रानी आखिर तक नहंी कहती कि दे दे जान! इस गीत का एक मौलिक अवदान यह रहा कि इसने साहित्य में आइटम रचना की अवधरणा प्रस्तुत की.जिस समय में सारे अवदानी चुक गए रहे और सदियों स कोई नई विध जन्म नहीं ले पा रही उस समयमें इस गीत ने आइटम विध को जन्म दिया। इस गीत की साहित्यिक व्याख्या के आड़े यही तत्व आया कि फिल्म में तो इस तरह के आइटम गीत चलते हैं और फिल्मों को चलाते हैं।ड्ढr हिन्दी साहित्य में आइटमसौंग की कोई विध नहीं बनी। उसका कारण ऐतिहासिक रहा। आत्मा की बात साहित्य में ज्यादा होती रही। होनी चाहिए थी आइटम की। सदियों से हिन्दी साहित्य जिस एक शब्द को खोज में भटक रहा था वह था ‘आइटम’ जिसकी जगह आत्मा को चलाया जाता रहा। आइटम ही आत्मा का असली रिप्लेसमेंट है। आइटम शब्द के आजाने से साहित्य पटरी परड्ढr आ गया है। हिन्दी में आइटमविध’ है। रचनाकार आइटम रचनाकार है।ड्ढr बिल्लोरानी की आइटमकथा ऐतिहासिक महत्व है। अब तो साहित्य में ‘चीयरलीडर्स’ का युग आ गया है ।

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