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सवालों के घेर में सरकारी अनुदान

सरकार कहती है कि वह किसानों को कई योजनाओं में 50 से 60 प्रतिशत तक अनुदान देती है। उधर किसान कहते हैं कि उन योजनाओं में उन्हें 25 से 30 प्रतिशत तक ही अनुदान मिलता है। किसका दावा सच है, इसका पता करने के लिए सरकारी प्रक्रियाओं को परखेंगे तो मालूम होगा कि दोनों के दावे अपनी जगह सही हैं। तो क्या मामला कमीशनखोरी से जुड़ा है? जी नहीं! वस्तुत: यह मामला योजनाओं के लागत खर्च के निर्धारण से जुड़ा है।ड्ढr ड्ढr सरकार जिस लागत खर्च को आधार मानकर 50 प्रतिशत अनुदान की राशि तय करती है वास्तविक लागत उसकी दूनी होती है। ऐसे में किसान जितना खर्च करता है अनुदान के रूप में प्राप्त राशि तो 25 प्रतिशत ही बनती है। ऐसा नहीं है कि सरकार इस मामले से अनभिज्ञ है। बल्कि केन्द्र ने तो कॉस्ट नॉर्म में सुधार के लिए लगभग एक वर्ष पहले ही प्रस्ताव दिया था। राज्य सरकार ने भी हरी झंडी दे दी है। फिर भी किसान वास्तविक लाभ से वंचित हैं। सरकार का जोर है कि किसान टिश्यू कल्चर केले की खेती करं। इस खेती में एक हेक्टेयर में चार हाार पौधे लगते हैं, एक पौधा की कीमत है लगभग 15 रुपये।ड्ढr इस प्रकार सिर्फ पौधा पर खर्च होता है 60 हाार। अनुदान तो सरकार 50 प्रतिशत देती है लेकिन वह मानती है कि इसका लागत खर्च सिर्फ तीस हाार है। इसी प्रकार चार हेक्टेयर में नर्सरी लगाने पर सरकार सिर्फ नौ लाख अनुदान देती है। यह 18 लाख लागत खर्च के आधार पर है। जबकि अपने संशोधित प्रस्ताव में केन्द्र सरकार खुद ही मानती है कि इसमें 35 लाख रुपये खर्च होंगे। ऐसा ही प्रस्ताव अधिसंख्य सरकारी योजनाओं के लिए है लेकिन साल भर से इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।

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