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अन्तरात्मा की आवाज

लता मंगेशकर अक्सर कहा करती हैं कि उनके जीवन का मूलमंत्र है ‘सिर्फ अपने आप से डरो। तुम स्वयं से पूछो कि क्या तुम्हारा रास्ता सही है? यदि तुम्हारा जवाब हां है, तो बिना दुबारा सोचे आगे बढ़ते जाओ।’ यह मंत्र उनके पिता और गुरु श्री दीनानाथ मंगेशकर ने दिया था। आज तक उन्होंने इसी आवाा का अनुसरण किया है। आप जीवन में सफलता पाना चाहते हैं तो अपनी कसौटी खुद ही बनना चाहिए। हमारे कर्मो के औचित्य को हमारी भीतरी शक्ित ही परखेगी। इस शक्ित को ‘अन्तरात्मा’ माना गया है। प्राय: हम लोग या तो अपने को नाकारा समझते हैं या अपने पर ही मुग्ध हो जाते हैं। आत्मग्लानि और अहंकार दोनों व्यक्ितत्व विकास और उन्नति में बाधक हैं। किसी भी काम को हाथ में लेकर अपनी पूरी ताकत लगा देने से आत्मविश्वास पैदा होता है। तभी अन्तरात्मा से सवाल-ावाब करने का विवेक आता है। भगवान की यह आवाा क्या कहती है? वह इनको तामसिक कर्मो से विमुख क्यों नहीं करती? वास्तव में ये लोग उस सूक्ष्म वाणी की चेतावनी को अनसुना कर देते हैं। धिक्कार के स्वर भी आमतौर पर उन्हें नहीं सुनाई पड़ते। धीर-धीर अहंकार भर घोष में इस चेतना का कंठ अवरुद्ध हो जाता है। कभी किसी महान आत्मा के सम्पर्क से ही अन्तरवाणी मुखर हो पाती है। भयंकर डाकू अंगुलीमाल जब महात्मा बुद्ध के सम्पर्क में आया, तभी उसकी क्रूरता विलीन हुई और उसकी अन्तश्चेतना जाग उठी। महात्मा गांधी भी इसी शक्ित की महत्ता समझाते थे। उनका कहना था ‘जब कर्तव्य का संघर्ष हो, जब तुम्हार भीतर बोलने वाली शान्त सूक्ष्म ध्वनि ही सदैव अंतिम निर्णायक होनी चाहिए।’ वे स्वीकार करते थे कि जब-ाब उन्होंने खुद भी इस आवाज की अवहेलना की, तब-तब उनकी उपयोगिता खत्म हो गई।ं

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  • Web Title: अन्तरात्मा की आवाज