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बुरा मानो या भला : चुनावों का रुख तय करेंगे मां-बेटे

आम चुनाव का दौर है। मैं जानना चाहता हूं कि इस देश में सबसे ज्यादा वोट बटोरने वाले नेता कौन हैं? कुछ लोग हैं जिनकी आवाज किसी खास इलाके में ही सुनी जाती है। मसलन, फारूक अब्दुल्ला या उनसे कहीं ज्यादा उनके बेटे उमर की कश्मीर में। प्रकाश सिंह बादल और पटियाला के अमरिंदर सिंह की पंजाब में। मुलायम सिंह की उत्तर प्रदेश में। जनरल बी. सी. खंडूरी की उत्तरांचल में। लालू, पासवान और नीतीश की बिहार में। नवीन पटनायक की उड़ीसा में। ममता बनर्जी की बंगाल में। जयललिता और करुणानिधि की तमिलनाडु में। शरद पवार की महाराष्ट्र में। नरेंद्र मोदी की गुजरात में। इसी तरह के कुछ और नेता होंगे, जिनके बार में मैं नहीं जानता। या मुझे याद नहीं आ रहा। लेकिन ये नेता लोग अपने खास इलाके के बाहर वोटर पर कोई असर नहीं रखते। हालांकि फिल्मी सितार अच्छी-खासी भीड़ जुटा लेते हैं, लेकिन वे किसी वोटर का मन नहीं बदल सकते। तो उनका भी कोई खास असर नहीं है। जब मैं पूर देश के बार में सोचता हूं, तो कुल चार नाम मेर जेहन मे आते हैं। यही लोग हैं जिनकी बात देशभर में सुनी जाती है। ये हैं लालकृष्ण आडवाणी, मायावती, राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी। हालांकि आडवाणी बेहतरीन भाषण देने वाले नहीं हैं। लेकिन वह अपनी बात बखूबी समझा सकते हैं। फिर वह लगातार आक्रामक मुद्रा में रहते हैं। उसका भी कुछ लोगों पर असर पड़ता है। अगर बीजेपी चुनावों में बेहतर करती है, तो वह अरुण जेटली के मैनेजमेंट और आडवाणी की तकरीरों की वजह से ही होगा। मायावती हाल ही में राष्ट्रीय नेता की तरह बर्ताव करने लगी हैं। बेहद कम वक्त में ही उन्होंने दलितों के वोट बटोर लिए हैं। देशभर में उनका असर पड़ने लगा है। आगे भी वह बेहतर करने वाली हैं। वह बड़ी पार्टियों के समीकरण बिगाड़ने का माद्दा रखती हैं। राहुल गांधी ने इधर अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी है। वह ठीकठाक भाषण देते हैं। अच्छी-खासी भीड़ भी जुटा लेते हैं। लोग भी उनकी बातों को गंभीरता से लेते हैं। अगर कांग्रेस बेहतर करती है, तो उसे राहुल का शुक्रगुजार होना होगा। मेरी लिस्ट में सबसे बड़ी भीड़ जुटाने वाली सोनिया गांधी हैं। वही सबसे ज्यादा वोट बटोरने वाली हैं। उनकी सभाओं में भीड़ एक खूबसूरत महिला को देखने ही नहीं आती है। उन्हें पता है कि सोनिया उनकी उम्मीदों पर पानी नहीं फिरने देंगी। उनके हाथ में देश बेहद महफूा है। उसे कोई खतरा नहीं है। अब किसी पर असर नहीं पड़ता कि वह विदेशी हैं। वह हिंदुस्तानी तहाीब को समझती हैं। हिंदुस्तानी लोगों की भावनाओं को जानती हैं। उनकी नब्ज को पहचानती हैं। अगर कांग्रेस पहले से भी ज्यादा सीटें जीतती है, तो वह सोनिया की इमेज के बिना नहीं हो सकता। मनमोहन सिंह की भी अगर प्रधानमंत्री के तौर पर इमेज बनी है, तो वह भी सोनिया की वजह से ही है। इन चुनावों का रुख तय करेंगे ये मां-बेटे। उषा महाजन ठीक 25 साल पहले उषा महाजन मेरी जिंदगी में आईं। मुझे वह पहली मुलाकात याद है। वह मेर आगे अपने दिल को उड़ेल कर रख रही थीं। उस वक्त अपने पति के साथ उनके रिश्ते बेहाल थे। कभी गुस्से और कभी आंसुओं के साथ वह अपनी आपबीती सुनाती चली जा रही थीं। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि एक बिल्कुल अनजान शख्स के आगे वह क्यों अपना दुखड़ा कह रही थीं? लेकिन उस आपबीती से मुझे लग गया था कि वह बेहतर कहानी लिख सकती हैं। तब मैंने उनसे कहा, ‘आपने जो भी मुझे सुनाया है, उसे लिख क्यों नहीं देतीं?’ उन्होंने अपने को संभाला और सोचती रहीं। फिर कई हफ्ते बीत गए। उषा ने कुछ कहानियां लिखीं। उसके बाद लिखने का सिलसिला चल पड़ा। मैंने उन कहानियों को पढ़ा। अंगराी में अनुवाद किया। वे कहानियां ‘द इलस्ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया’ में छपीं। अब वह एक अलग शख्सीयत हो गई थीं। अपने पति से रिश्ते बेहतर हो गए थे। उनकी तीन बेटियां मां पर फख्र करने लगी थीं। और परिवार हो गया सुखी। उषा के लेखन की सिल्वर जुबली हो गई। उसी सिलसिले में एक दिन वह और उनके पति बर्फी और रसगुल्ले ले कर मेर घर आए। इसी मौके पर उनकी पच्चीसवीं किताब भी आई। हिंद पॉकेट बुक्स से आई वह किताब है ‘औरतें तथा अन्य कहानियां।’ साथ में मेरी ‘हिस्ट्री ऐंड रिलिजन ऑफ सिख्स’ का हिदी अनुवाद ‘सिखों का इतिहास’ भी किताबघर से आया है। एक साल में एक किताब! यह तो कमाल है। अपनी परशानियों से निकलने में लेखन भी एक जरिया हो सकता है। वाह!

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