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कोई तो बताए, कहां मिल रहीं सस्ती चीजें

माफ करें, हमने ईमानदार कोशिश की लेकिन दिल्ली सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग के दावे हमें सही नहीं मिले। विभाग की बात पर यकीन कर हमलोग रविवार को सामान खरीदने निकले लेकिन हमें उस रट पर चीजें नहीं मिलीं जिसका दावा किया जा रहा है। विभाग ने शुक्रवार को जो रट बताए थे और शनिवार के अंक में जिसे हमने प्रकाशित भी किया था, वे काफी कम थे जबकि रिटेल बाजार में दाम अलग कहानी कह रहे हैं। दिल्ली सरकार अखबारों में विज्ञापन देकर आलू चार रुपये तो गेहूं 1पये और अरहर दाल तैंतीस रुपये प्रति किलो बता रही है लेकिन आम लोग किन दुकानों से इसे खरीदें, यह पता देना शायद वह भूल गई है। दिल्ली और एनसीआर के छोटे-बड़े किराना स्टोरों में आवश्यक वस्तुओं का जायजा लेने पर पता चलता है कि दावे और असलियत में बड़ी खाई है। दाल-रोटी खा कर जी लेंगे की बात भी मान ली जाए तो आम आदमी से यह भी दूर होता दिख रहा है। दिल्ली सरकार के उपभोक्ता महकमे ने अनाज के अलावा यह दावा भी किया था कि चीनी 18 रुपये प्रति किलो और सरसों तथा मूंगफली का तेल क्रमश: 73 रुपये और 120 रुपये प्रति लीटर बाजार में मिल रहा है। इनमें एक से दो रुपये की कमी की बात कही गई। सरकार के बताए भाव और दिल्ली तथा एनसीआर के खुले बाजार में चल रहे भाव में एकाध चीजों को छोड़कर साफ अंतर दिखता है। उसके दावों की कलई खुल जाती है। अकेले साबुन की कीमतों में 15 प्रतिशत क्षाफा हुआ है। बिस्कुट की कीमतें भी दस से बारह प्रतिशत बढ़ी हैं। दूध के भाव को लेकर उसका दावा जरूर सही है। विभाग ने कहा है कि पिछले 6 महीने के भीतर दूध के दाम स्थिर रहे। मदर डेयरी, पारस और अमूल ने पिछले साल 18 से 20 अक्तूबर के बीच फूल क्रीम, टोंड, डबल टोंड के अपने रेट एक-एक रुपये बढ़ा दिए थे। प्रमुख अर्थशास्त्रियों की संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इक्नोमिक एंड रिसर्च के अर्थशास्त्री डॉ. दिलीप कुमार कहते हैं कि सरकार को दिल्ली में आवश्यक वस्तुओं के भाव कम होने के दावे करने की जरूरत न पड़ती यदि उसने जमाखोरों को कस दिया होता। मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए एकाध बार इन पर छापे मारने से महंगाई कम नहीं होती। यह तो सच्चाई है कि अनाज संकट ग्लोबल है लेकिन दिल्ली-एनसीआर के बाजारों में कमी और अधिक रट का बड़ा कारण थोक से रिटेल बाजार तक सामान पहुंचने का अर्थशास्त्र और जमाखोरों-कालाबाजारियों की जुगत है। इस पर रोक के बिना महंगाई सरकार को परशान करती ही रहेगी।

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