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मैनेजर पांडेय राष्ट्रीयता को बहुवचनीय मानते

प्रख्यात आलोचक मैनेजर पांडेय का आलोचना कर्म साम्राज्यवादी संस्कृति के प्रतिरोध में खड़ा है। सांप्रदायिक फासीवादी उभार के दौर में भी उन्होंने माक्र्सवाद पर मजबूती के साथ कायम रहकर समझौताविहीन आलोचनात्मक संघर्ष चलाए रखा। आलोचक व जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने रविवार को मैनेजर पांडेय के आलोचना कर्म पर केंद्रित सांस्कृतिक विमर्श के समकालीन संदर्भ विषय पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए उक्त बातें कहीं।ड्ढr ड्ढr इस अवसर पर जसम ने सांस्कृतिक संकुल की स्थापना, साहित्यकार अमरकांत को पचास हजार रुपए की आर्थिक मदद ,प्रकाशन केन्द्र की स्थापना व हिरावल पीपुल्स थिएटर बनाने का फैसला लिया है। श्री कृष्ण ने मैनेजर पांडेय के आलोचना कर्म पर विस्तार से अपनी बातें रखते हुए प्रख्यात आलोचक डा.नामवर सिंह के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी पेश किया। नामवर सिंह जहां राष्ट्रीयता के स्वर को एकवचनीय मानते हैं वहीं श्री पांडेय इसे बहुवचनीय कहते हैं। नामवर सिंह पचास के दशक को सांस्कृतिक नवजागरण का दौर व 62 के दशक को मोहभंग का दौर कहते हैं। इस पर सवाल उठाते हुए श्री पांडेय कहते हैं कि पचास के दशक में ही देश का बंटवारा, गांधी की हत्या, सांप्रदायिक दंगा,राजनीति व साहित्य में बिखराव का दौर रहा तो ऐसे में सांस्कृतिक नवजागरण कैसे संभव है।ड्ढr ड्ढr कवि अरुण कमल ने कहा कि संस्कृति हमें बताती है कि दुनिया को कैसे समझें। आज दुनिया को बदलने के साथ ही उसकी सही व्याख्या का सवाल भी महत्वपूर्ण है। जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय ने कहा कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा था कि इस राष्ट्रवाद से साम्राज्यवाद का मुकाबला संभव नहीं है। आलोचक रामनिहाल गुंजन ने अध्यक्षता की। डा.रवीन्द्रनाथ राय ने भी अपने विचार रखे। संचालन सुधीर सुमन ने किया। समारोह में मधुकर सिंह, पवन शर्मा, सरोज चौबे, अरविंद कुमार, भी मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन संतोष झा ने किया।

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