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बुंदेलखंड में कृत्रिम वर्षा की योजना अधर में

बुंदेलखंड में कृत्रिम वर्षा कराए जाने के संबंध में सरकार के मंसूबों की कलई अभी से खुलने लगी है। प्रदेश की जिस उच्च स्तरीय टीम को 25 अप्रैल से पांच मई के बीच आंध्र प्रदेश जाकर कृत्रिम वर्षा के बारे में अध्ययन करना था वह टीम वहां गई ही नहीं। प्रदेश के कृषि उत्पादन आयुक्त राकेश कुमार मित्तल की अध्यक्षता में 21 अप्रैल को सात विभागों की एक बैठक हुई थी, जिसमें क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) के संबंध में विस्तृत विचार हुआ था। इसमें आंध्र प्रदेश के मॉडल पर बुंदेलखंड में कृत्रिम वर्षा कराने का निर्णय लेते हुए एक चार सदस्यीय टीम वहां भेजने के बाबत आदेश जारी किया गया था। इस टीम में कृषि विभाग के प्रमुख सचिव, रमोट सेंसिंग अप्लीकेशन सेंटर के निदेशक, भूगर्भ जल विभाग के निदेशक और मौसम विभाग के निदेशक को शामिल किया गया था। इस टीम को आंध्र प्रदेश के उन जिलों में जाना था, जहां क्लाउड सीडिंग का कार्य किया जा रहा है। बैठक में कृत्रिम वर्षा पर आने वाले खर्च का भी आकलन किया गया। आंध्र प्रदेश में कृत्रिम वर्षा के लिए सिल्वर नाइट्रेट के स्थान पर कैल्शियम क्लोराइड का प्रयोग किया जा रहा है, जो भारत जसे गर्म जलवायु वाले देश के लिए उपयोगी सि हुआ है। कृत्रिम वर्षा के लिए दो राडार और दो जहाज की आवश्यकता होती है और प्रतिदिन 18 लाख रुपये का खर्च आता है। कृत्रिम वर्षा के चार महीने के कार्यक्रम पर 22 करोड़ का ऑपरेशनल व्यय अनुमानित है। आंध्र प्रदेश के काडपा, नेल्लोर, करनूल, चित्तूर, अनंतपुर, गुंटूर और प्रकाशम जिलों में कृत्रिम वर्षा का अध्ययन करने के लिए चार सदस्यीय टीम को 25 अप्रैल को जाना था और इसकी रिपोर्ट के आधार पर बुंदेलखंड में कृत्रिम वर्षा के लिए आगे की कार्रवाई की जानी थी।

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