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ईरानी पाइपलाइन से परमाणु समझौते की राह

अमेरिका और ईरान दोनों को ‘रणनीतिक साझीदार’ बताना भारत क लिए हमशा कठिन रहा था। दोनों दशों क साथ यह साझीदारी कायम होन क आठ साल बाद भी यही स्थिति बनी हुई है। अमरिकी नतृत्व ने ईरान को ‘शैतानी की धुरी’ मं शामिल कर रखा है और तहरान मं ‘सरकार बदलन’ की बात वह खुलआम कहता है। ईरान की नजर मं अमरिका आज भी ‘बड़ा शैतान’ है और राष्ट्रपति अहमदीनजाद अपन राजमर्रा क आग उगलन वाल भाषणों मं अमरिका को ‘दादागिरी करन वाली एक ताकत’ कहते रहत हैं, जो दुनिया की सारी समस्याओं क लिए जिम्मदार है। यह कहना भी राजनयिक तौर पर कमतर आंकना होगा कि इन दो दशों क साथ संबंधों मं भारत राजनयिक रूप स तनी हुई एक रस्सी पर चल रहा है। पिछले बृहस्पतिवार को ईरानी राष्ट्रपति की चंद घंटों की भारत-यात्रा इसी संदर्भ मं दखी जा रही है। ईरानी राष्ट्रपति की इस यात्रा का मार्ग प्रशस्त करन और अपनी ‘अमरिका-विरोधी’ बातं कहन दन क साथ ही इस बात की गुंजाइश भी रहने दी कि भारत अमरिका क साथ अपन रिश्त प्रगाढ़ रखे रहे। लकिन, यह सवाल अपनी जगह कायम है कि भारत मं संशयवादी, और खासकर वामपंथी दल इस कोशिश स प्रभावित होंग या नहीं। अहमदीनजाद जब 2005 मं ईरानी राष्ट्रपति चुन गए, तभी स वह भारत आना चाहत थ। लकिन, चार साल तक उनक दिल्ली आन की तमन्ना पूरी करन को लकर तारीख तय करन मं भारतीय विदश मंत्रालय अपन पांव पीछ खींचता रहा। अहमदीनजाद मं भारत क अचानक दिलचस्पी दिखान क बार मं अनक लोगों की भौहं तन गई हैं। अमरिकी विदश मंत्रालय क प्रवक्ता न सुझाव दिया कि ईरान स भारत कह कि वह अपना यूरनियम संवर्धन कार्यक्रम बंद कर द। अमरिका और अनक दशों को आशंका है कि ईरान परमाणु बम बनान क लिए यह कार्यक्रम चला रहा है। ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्दश्यों क लिए है और वह सस्ती परमाणु बिजली पान क लिए इस चला रहा है। चंद साल पहल ईरान क परमाणु कार्यक्रम क बार मं भारत उतना ही शंकालु था, जितना कि आज बाकी दुनिया है। सितंबर, 2005 मं अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजंसी (एआईईए) क बोर्ड ऑफ गवनर्स की बैठक मं ईरान क खिलाफ लाए गए प्रस्ताव क पक्ष मं भारत न वोट दिया था। लकिन, ईरानी राष्ट्रपति की भारत यात्रा क चंद दिन पहल ही भारत न अमरिका स कहा कि उस यह तय करन का अधिकार नहीं है कि ईरानी परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्दश्यों क लिए है या नहीं। उसन सलाह दी कि अमरिका आएईए को इस मामल की जांच और तय करन द कि ईरान उन दायित्वों को पूरा कर रहा है या नहीं, जिन्हं परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करन क नात वह उन्हं मानन को बाध्य है। दिलचस्प बात यह है कि य टिप्पणियां करन वाल विदशमंत्री प्रणव मुखर्जी न यह भी कहा कि अमरिका क साथ असैन्य परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौत 123 को अंतिम रूप दन स पहल उनकी सरकार संसद की ‘समुचित राय’ लगी। यह शायद एक स्पष्ट संकत था कि आगामी दिनों मं परमाणु समझौत को लकर संप्रग सरकार न आखिरी प्रयास करन का इरादा बना लिया है। इस समझौत क बार मं भारतीय सांसदों क बीच मूड बनान मं ईरान मदद कर सकता है। वामदलों का विरोध इस आशंका पर आधारित है कि एक बार समझौता होन पर भारत को अपनी स्वतंत्र विदश नीति छोड़न पर मजबूर कर दिया जाएगा। पिछल तकरीबन एक साल स कांग्रस नतृत्व विरोधियों को आश्वस्त करन का प्रयास कर रहा है कि अमरिका क साथ गहर रिश्त कायम करन का मतलब यह नहीं है कि अन्य महत्वपूर्ण दशों क साथ भारत क पारम्परिक संबंध कमजोर हो जाएंग। एक साल क भीतर ही सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह न चीन की यात्रा की है और स्पष्ट संकत दिए हैं कि चीन क साथ गहर रिश्त रखना भारत क लिए महत्वपूर्ण है। सरकार न रूस, यूरोपियन यूनियन और अन्य दशों क साथ भी रिश्त प्रगाढ़ किए हैं। लकिन दूसर दशों की तुलना मं ईरान अधिक महत्वपूर्ण होगा। अनक अवसरों पर अमरिका न स्पष्ट किया है कि वह दिल्ली और तहरान क बीच किसी भी प्रकार क उन आर्थिक या अन्य रिश्तों को पसंद नहीं करता, जिसस ईरानी सरकार को वैधता प्राप्त हो। भारत क पास यह साबित करन क दो महत्वपूर्ण मसल हैं कि ईरान क साथ रिश्तों मं वह आग बढ़ा है। एक का वास्ता उसक परमाणु कार्यक्रम स है। आईएईए मं ईरान क खिलाफ वोट दन क बाद इस विवादास्पद मसल स भारत न अपन आपको एक सुरक्षित दूरी पर रखा है। अहमदीनजाद न भी माना है कि ईरान क खिलाफ भारत क वोट स कुछ समय तक संबंधों मं तनाव आया था। भारत-ईरान सहयोग की एक प्रतीक गैस पाइपलाइन है। जब भारत न सस्त मूल्य पर ईरान स प्राकृतिक गैस की बरोकटोक सप्लाई पर उसक साथ समझौता किया था, तब स इस पाइपलाइन क बार मं दश मं मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई है। कुछ लोगों न इस ‘शांति की पाइपलाइन’ कहा है, क्योंकि वह पाकिस्तान स गुजरन क कारण दिल्ली और इस्लामाबाद क बीच संबंध सुधार मं मददगार होगी। अन्य लोगों न किसी भी एस प्रस्ताव का विरोध किया, जिसमं पाकिस्तान को शामिल किया जाता हो। लकिन, अब ईरान-पाकिस्तान-भारत पाइपलाइन एक प्रमुख प्रतीक बन गई है। अमरिकी मीडिया क साथ एक इंटरव्यू मं मनमोहन सिंह न कहा था कि यह परियोजना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि कोई भी निवशक इसमं धनराशि लगान का इच्छुक नहीं है। लकिन, वामदलों न इस अमरिकियों को खुश करन क मनमोहन सिंह क एक प्रयास क तौर पर दखा था। स्पष्ट कारणों स व जोर दत रह हैं कि गैस पाइपलाइन पर यथाशीघ्र अमल सुनिश्चित करन क लिए भारत को इस समझौत पर हस्ताक्षर करन चाहिए। अहमदीनजाद क साथ बातचीत क बाद यह परियोजना आग बढ़गी। तीनों दशों क तलमंत्री 45 दिनों क भीतर अपनी रिपोर्ट दंग। यदि इस समयसीमा क भीतर व रिपोर्ट द दत हैं तो भी भारत, पाकिस्तान और ईरान की सरकारों को इस परियोजना को अंजाम दन मं काफी लंबा वक्त लगगा। कांग्रस नीत संप्रग सरकार तो यही आशा कर रही है और उसक नताओं का मानना है कि ईरान क प्रति अपनाई गई सरकारी भंगिमाएं स्वतंत्र विदश नीति क उनक दाव को पुख्ता बनान मं मदद देगी।ड्ढr लखक आईएएनएस क (रणनीतिक व विदशी मामल) संपादक हैं

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