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बुश भैया, अपना तो टॉमी भी डट कर खाता है

अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के लिए बुरी खबर! भारत में सिर्फ लोगों की ही नहीं, बल्कि उनके पालतू कुत्ते और बिल्लियों की भी खुराक पहले से कहीं बेहतर हुई है। वर्ष 2004 में भारत के लोग अपने कुत्ते-बिल्लियों के भोजन पर जहां दो करोड़ डॉलर खर्च कर रहे थे, वहीं सन 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर दो करोड़ नब्बे लाख डॉलर पहुंच गया है। लेकिन यह यह अभी भी अमेरिकीयों के मुकाबले काफी कम है। पिछले साल अमेरिका में पालतू कुत्ते-बिल्लियों के खाने-पीने पर 15.2 अरब डॉलर खर्च हुए जबकि 2004 में यह राशि 13.8 अरब डॉलर थी। बहरहाल इस मामले में दोनों देशों की तुलना के बीच राष्ट्रपति बुश की असल तकलीफ का कारण यह हो सकता है कि भारत अपने इन पालतू जानवरों के भोज्य पदार्थ के मामले में भी अमेरिका से होड़ करता नजर आ रहा है। दअसल कुत्ते-बिल्लियां पालने का शौक नए उभरे भारतीय मध्यम वर्ग की अभिरुचियों में शामिल होता जा रहा है। इसका असर कहीं न कहीं पालतू जानवरों के भोज्य पदार्थो की कीमत पर पड़ना लाजमी है। फिर वैश्वीकरण के इस दौर में भला अमेरिका इससे अछूता कैसे रह सकता है। खुली बाजार व्यवस्था के चलते भारत में मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है और पालतू जानवरों का उनका शौक भी परवान चढ़ा है। ऐसी सूरत में जाहिर है, पैटफूड्स के ग्लोबल मार्केट का भविष्य काफी उवल दिखलाई दे रहा है। अनुमान है कि अगले दो सालों में इसमें 25 से 30 फीसदी तक क्षाफा हो सकता है। ऐसा होने की एक बड़ी वजह यह कही जा रही है कि ऐसे मध्यमवर्गीय ग्राहकों की संख्या में क्षाफा हुआ है जो अपने कुत्ते-बिल्लियों के लिए घर में बने भोजन की बजाय उनके लिए खासतौर पर तैयार रडिमेड फूड खरीदना पसंद करने लगे हैं। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत की तेजी से बढ़ती विकास दर का भी इस दिशा में अहम रोल है जिसके चलते पालतू जानवरों के शौक के साथ-साथ उनकी खुराक के मामले में भी लोगों की समझ समझ बढ़ी है। मौजूदा समय में पशु आहार की बिक्री एक बेहतर कारोबार में बदल चुकी है और ऐसे कुल आहार के 44 फीसदी पर इस बाजार का कब्जा हो चुका है। हाल ही में बुश ने कहा था कि विश्वभर में खाद्यान्न की बढ़ती मांग के कारण ही कीमतें बढ़ रही हैं। उनका कहना था कि भारत में 35 करोड़ आबादी का मध्यम वर्ग पनप चुका है। जो कि अमेरिका की कुल आबादी से अधिक है।ं

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