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बिना कॉपीराइट छप गयीं दो लाख किताबें

बिना कॉपी राइट के ही दो लाख किताबें छप गयी। इससे सरकार को 56 लाख रुपये का चूना लगा है। एनसीइआरटी ने इस पर आपत्ति जताते हुए नयी किताबें छापने को कहा है। इससे पदाधिकारियों के होश उड़ गये हैं। मजेदार यह है कि शिक्षा परियोजना के पदाधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए सारा दोष एनसीइआरटी पर मढ़ रहे हैं। परियोजना ने वितरित की गयी सभी किताबों को वापस लेना शुरू कर दिया है। आठवीं क्लास के लिए सामाजिक विज्ञान भाग एक (इतिहास) की 1.लाख किताबें छपी है। इसमें 55,84,504 रुपये प्रकाशक को दिये गये हैं। पूर राज्य में किताबों का वितरण भी शुरू हो गया था। ऐन मौके पर एनसीइआरटी के आदेश के आलोक में किताबें वापस ली जा रही हैं। 26 सितंबर 2007 को ही शिक्षा सचिव जेबी तुबिद ने कॉपी राइट के लिए पत्र एनसीइआरटी को भेजा था। बीच-बीच में रिमाइंडर भी भेजा गया। कोई जवाब नहीं मिलने पर पदाधिकारी इसे मौन सहमति मान बैठे। नतीजा हुआ कॉपी राइट के इंतजार में दिसंबर में किताब छपाई का वर्क ऑर्डर दे दिया। इस साल इसी किताब को झारखंड में लागू रहने देने की मांग सरकार करगी। इसके लिए उच्चस्तरीय बातचीत चल रही है। 2005 में भी एनसीइआरटी और राज्य सरकार के बीच विवाद हुआ था। इस कारण पूर साल किताबें नही मिल पायी थी। हमेशा यही प्रोसेस रहा : निदेशक शिक्षा परियोजना के निदेशक राजीव अरुण एक्का ने कहा कि किताब छपाई के लिए हमेशा यही प्रोसेस रहा है। कॉपीराइट मिलने में हो रहे विलंब के कारण किताब छपाई का ऑर्डर दिया गया। किताब छप कर जब बच्चों को दी जाने लगी, तब एनसीइआरटी ने नये सिलेबस से किताब छापने की बात कही। नयी सीडी मिलने के बाद ही पता चलेगा कि कितना संशोधन होगा। फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता।

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