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नए अवसरों के खुलते दरवाजे

यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की सबसे सफल अमेरिका यात्रा है। और तो और, यह दुनिया भर के शासनाध्यक्षों के सफल अमेरिकी दौरों में से एक माना जाएगा, क्योंकि फर्क एकदम साफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के विशाल और विविध क्षेत्रों में बड़ा व दूसरों से अधिक अंतर लाने वाले प्रभाव छोड़े हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से औपचारिक व निजी मुलाकातों, अमेरिकी प्रशासन के तमाम विभागों, अमेरिकी थिक टैंक, अमेरिकी उद्योगपतियों और ‘इंडियन डायस्पोरा’ से बातों में उन्होंने अपनी और भारत की छाप छोड़ी है। अपने संबोधनों में उन्होंने अमेरिका ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय कारोबार और बाकी वैश्विक समुदाय का भी ध्यान रखा, यानी एक बड़े मंच का प्रधानमंत्री ने पूरा फायदा उठाया है। जैसे, संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में उन्होंने दो टूक कहा कि ‘मैं मित्रता और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए आतंकवाद के साये के बिना शांतिपूर्ण माहौल में पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता को तैयार हूं।... यद्यपि पाकिस्तान को भी एक उचित माहौल बनाने के लिए अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए।’ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाषण में कश्मीर में जनमत संग्रह कराने पर जोर था, जिसका जवाब मोदी ने बिना उस संबोधन का सीधा उल्लेख किए हुए दिया- ‘इस मंच से ऐसे मुद्दों को उठाने से उनके समाधान कितने सफल होंगे, इसे लेकर कइयों को शक है।’ पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और कश्मीर को लेकर हिन्दुस्तान की समझ एकदम साफ है और इस आम समझ को कोई किस मंच से उठाता है और किस तरह दूसरे की समझ में प्रवेश कराता है, यही सबसे बड़ा फर्क पैदा करता है। नरेंद्र मोदी ने हमारे पक्ष को स्पष्ट रूप से रखा कि मित्रता चाहते हैं, तो मित्र जैसा व्यवहार कीजिए।

प्रधानमंत्री ने अमेरिकी दौरे पर ‘भारत सरकार की विश्वसनीयता और उसकी साख’ को सुनिश्चित किया। संभवत: पहली बार पश्चिम के मंच को यह लगा कि ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया मीन्स बिजनेस।’ यह भरोसा पैदा करना सभी मोर्चों पर संभावनाओं व अवसरों के द्वार खोलने जैसा है। आलोचक यह मुद्दा उठा सकते हैं कि नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे पर काफी कुछ कहा गया, खुद उनकी तरफ से और उनकी टीम की तरफ से भी। लेकिन विदेश दौरों पर अपनी बातों को साफ-साफ कह देना और धैर्यपूर्वक सामने वाले के हितों को जानना-सुनना (यहां नरेंद्र मोदी न सिर्फ अमेरिकी प्रशासन की चिंताओं से रूबरू हुए, बल्कि अमेरिकी उद्योगपतियों, निवेशकों और भारतवंशियों की समस्याओं, शंकाओं और चिंताओं से भी वाकिफ हुए) ही कूटनीति है। इसलिए प्रधानमंत्री की इस यात्रा से उत्साह और उम्मीद का माहौल बना है, जो एक बड़ी उपलब्धि है।

विदेश नीति में यह भी मायने रखता है कि यात्रा के दौरान कोई प्रतिनिधि अपने देश की क्षमताओं को किस तरह से पेश करता है और देश के हित को कैसे साधता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के कौशल, संसाधन और उसकी युवा कार्य-शक्ति का प्रदर्शन कर अमेरिका के सामने भारत के विकास का मुद्दा पेश कर दिया है। यहां भी वह ‘मेक इन इंडिया’ की गंभीरता को लोगों के सामने लाने में सफल रहे। दरअसल, वह बताना चाहते हैं कि भारत अपनी शर्तों से पीछे नहीं हटेगा, लेकिन अमेरिका की ‘वास्तविक कठिनाइयों’ को दूर किया जाएगा। जाहिर है कि पहले पड़ोसी भूटान व नेपाल यात्रा और उसके बाद ब्रिक्स में शिरकत तथा जापान दौरे के पश्चात  अब अमेरिकी यात्रा में मोदी यह संदेश देने में सफल रहे कि उन्होंने बाहर अपना काम कर लिया है और निवेशक भारत की ओर रुख करेंगे। अमेरिकी चिंताओं में भी मुख्य तौर पर आपसी व्यापार ही है, जो साल 2006 में 25 अरब डॉलर था और पिछले साल बढ़कर 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार अमेरिका ही है और वह इस आपसी साझेदारी को कई गुना और बढ़ाना चाहता है। लेकिन अमेरिका की चिंताएं ब्यूरोक्रेसी की अड़चनों और लाइसेंस व परमिट राज से जुड़ी हैं। इस तरफ, ध्यान देने की आवश्यकता है। इस दौरे में बंधी उम्मीद और साफ नजर आ रहे उत्साह के बाद यही असली चुनौती है।

अब गेंद अमेरिका के पाले में है। यदि अमेरिका भारत के साथ अपने कारोबार को बढ़ाना चाहता है और उसे अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर साथ लाना चाहता है, तो उसे इस देश के साथ अपने संबंध मजबूत बनाने होंगे। जाहिर है, इसके लिए सबसे पहले अमेरिका को अपना कूटनीतिक रवैया बदलना होगा। भारत दुनिया की आबादी का छठा हिस्सा है। यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, प्रेस को आजादी है। दुनिया में भारत की पहचान एक सहिष्णु राष्ट्र की है और यहां सर्वधर्म समभाव है। हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। ये ऐसी खासियतें हैं, जो काफी हद तक भारत और अमेरिका को जोड़ती हैं। ऐसे में, भारत-अमेरिका संबंधों को विशेष दर्जा देने की जरूरत है। आतंकवाद और इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ दोनों देशों का रवैया लगभग एक समान है। यहां एक-दूसरे के ऑपरेशनल लेवल पर भरोसा बढ़ाना होगा।

अमेरिका को अपनी एशिया नीति पर भी गौर करने की जरूरत है, क्योंकि वह कई देशों को आम्र्स-सप्लाई करता है। पाकिस्तान उनमें से एक है, और वहां की  विनाशकारी स्थिति किसी से छिपी नहीं है। पड़ोस की स्थिरता में ही हमारी शांति निहित है। चीन को पश्चिम से परमाणु तकनीक मिलती रही है और आज वह परमाणु प्रौद्योगिकी का एक बड़ा देश बन चुका है। हालांकि, चीन के प्रति अमेरिका का रवैया अब बदल चुका है, लेकिन बहुत से कारणों से हमारी सुरक्षा चिंताएं बरकरार हैं। भारत-चीन संबंध भी महत्वपूर्ण हैं और इस तरफ अमेरिका को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। कोई चीन को घेरने भर के लिए ही भारत से गठबंधन नहीं करना चाहेगा, लेकिन एशिया में शांति और सद्भाव का माहौल बने, इससे किसी को परहेज नहीं होना चाहिए। इसके लिए भारत, चीन, अमेरिका, जापान और रूस एक साथ काम कर सकते हैं। 

स्वाभाविक है कि दोनों देशों के आपसी रिश्तों में अर्थव्यवस्था एक बड़ा मुद्दा है। भारत में हथियारों का बनना और तकनीक-हस्तांतरण अहम हैं। इसमें यह भी जरूरी है कि अमेरिका नवीनतम तकनीक भारत से साझा करे। इस क्षेत्र में अमेरिकी सहयोग से भारत बड़े पैमाने पर हथियारों का निर्यात कर पाएगा, जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी स्थिति होगी। भारत-अमेरिका समझौते से ऐसे कई अवसर निकलते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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