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ब्लॉग वार्ता : मर्ज और मरीचा की मजेदार बातें

ाहां जानकारी के अलावा इनके बीच निदान के तरीकों पर खूब बहस चलती है। दुनिया भर में तमाम भाषाओं में डॉक्टरों के अपने ब्लाग हैं। हिंदी में ज्यादा तो नहीं लेकिन कमी नहीं। बेजी भी अपना एक मेडिकल ब्लाग चलाती हैं जहां एलोपैथी चिकित्सा के बार में जानकारी मिलती है। यह एक सुखद शुरुआत है। अक्सर हिंदी के अखबारों में डॉक्टरों के कॉलम तो होते हैं, लेकिन उनमें उन्हीं बीमारियों की चर्चा ज्यादा होती है जो मीडिया में खास वजह से चर्चित होती हैं। मिसाल के तौर पर सव्रे निकलने वाली बीमारियां। सव्रे से बड़ा डॉक्टर कोई नहीं। आजकल मीडिया में हर दिन किसी न किसी सव्रे के हवाले से रोग का ब्रेकिंग न्यूज की तरह उाागर करने का दौर चला है। सव्रे ने पहले समाज के आधार पर बांटा, फिर लिंग के आधार पर और फिर रोग के आधार पर। हर सव्रे कुछ कहता है। बच्चों को ब्लड प्रेशर है, तो बूढ़ों को शुगर। हर सुबह इन सेहत सव्रे को देखकर भला-चंगा पाठक भी बीमार महसूस करने लगता होगा। फिर उन रोगों पर भी जिन पर बाजार की नजर है। जहां जानकारी के अलावा इनके बीच निदान के तरीकों पर खूब बहस चलती है। दुनिया भर में तमाम भाषाओं में डॉक्टरों के अपने ब्लाग हैं। हिंदी में ज्यादा तो नहीं लेकिन कमी नहीं। बेजी भी अपना एक मेडिकल ब्लाग चलाती हैं जहां एलोपैथी चिकित्सा के बार में जानकारी मिलती है। यह एक सुखद शुरुआत है। अक्सर हिंदी के अखबारों में डॉक्टरों के कॉलम तो होते हैं, लेकिन उनमें उन्हीं बीमारियों की चर्चा ज्यादा होती है जो मीडिया में खास वजह से चर्चित होती हैं। मिसाल के तौर पर सव्रे निकलने वाली बीमारियां। सव्रे से बड़ा डॉक्टर कोई नहीं। आजकल मीडिया में हर दिन किसी न किसी सव्रे के हवाले से रोग का ब्रेकिंग न्यूज की तरह उाागर करने का दौर चला है। सव्रे ने पहले समाज के आधार पर बांटा, फिर लिंग के आधार पर और फिर रोग के आधार पर। हर सव्रे कुछ कहता है। बच्चों को ब्लड प्रेशर है, तो बूढ़ों को शुगर। हर सुबह इन सेहत सव्रे को देखकर भला-चंगा पाठक भी बीमार महसूस करने लगता होगा। फिर उन रोगों पर भी जिन पर बाजार की नजर है। जहां कारोबार के प्रसार के अच्छे आसार हैं। कुछ वे रो जो लाइफ स्टाइल वाले हैं, या वे जिनका अपना एक ग्लैमर है, या वे जिन्हें अमीर उमरा के रोग मान लिया गया है। कंफ्यूजन के इस दौर में मेडिकल जगत में काफी फ्यूजन हो रहा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का आयुष विभाग आयुर्वेदिक, योग, यूनानी और होम्योपैथी जसी वैकल्पिक चिकित्सा व्यवस्था का प्रसार करने का जिम्मा उठाता है। उसी का एलौपैथिक विभाग इन वैकल्पिक चिकित्सा को खारिा करता है। जाहिर है हर तरफ फैले इस कंफ्यूजन से मरीा परशान है। मर्ज तो परशान करने के लिए पहले ही से है। डॉ. टंडन कहते हैं कि उनके ब्लाग से होम्योपैथी के बार में खासी जानकारी मिलती है। हाल ही में उन्होंने चिकन पाक्स के बार में होम्योपैथी उपचार के बार में लिखा। अभी वो लू और उससे होने वाली बीमारियों के उपचार के बार में लिखना चाहते हैं। उनका कहना है कि यह प्रचार के लिए नहीं है बल्कि संवाद के लिए है। होम्योपैथी के डॉक्टर और छात्र और इसका सेवन करने वाले आम लोगों के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान होना चाहिए। केरल की डॉ. बेजी का हिन्दी में स्पदंन नाम से ब्लॉग है। पता है स्र्rड्ढद्गद्भन्ह्यस्र्द्गह्यद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व बाल विशेषज्ञ डॉ. बेजी स्तनपान से लेकर बच्चे को मां से मिलने वाली बीमारियों के बार में लिख रही है। बेजी कहती हैं कि प्रसव के आधे घंटे के भीतर शिशु को स्तनपान कराना चाहिए। आगे लिखती हैं- फैशन, ट्रेंड और फीगर के बहाने स्तनपान न कराने का चलन दुखद है। वो स्तनपान कराने का सही तरीका भी बता रही हैं। बेजी बिल्कुल सरल शब्दों में बताती हैं कि मां-बाप के खून का बच्चे के बल्ड ग्रुप पर क्या असर पड़ता है। बेजी गर्भधारण से जुड़ी अवधारणाओं पर भी अपने तरीके से चोट करती हैं। कहती हैं पॉपुलर सिनेमा में गर्भधारण की खबर हिरोईन के बेहोश होने के साथ मिलती है। फिर बहु का चमकता लजीला चेहरा। लोरी गाकर बच्चे को सुलाती मां। किंतु यह परिवर्तन इतना सहा नहीं है। गर्भधारण से लेकर स्तनपान तक सभी जानकारी आसान शब्दों में, वो भी हिन्दी में और बिना फीस के। जाहिर है इन तमाम विषयों पर डॉक्टरों का लिखा पढ़ना कम रोचक नहीं। वो मजा अखबारों से साप्ताहिक कॉलम में नहीं आता। यहां अवधारणाओं से छेड़छाड़ है, बीमारियों को लेकर बहस है और राहत की बात यह है कि नीम हकीम नहीं बल्कि खुद डॉक्टर ब्लागर हैं। बहस का मजा लीजिए और जागरूक मरीा बनिये। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि ये ब्लॉग डॉक्टर का विकल्प हैं। यहां बताई गई दवाओं को बिना किसी डॉक्टर की सलाह के खाना कभी नीम हकीम की दवाओं से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। ये ब्लॉग रोग के बार में आपकी समझ तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन दवा के लिए आपको डॉक्टर के पास ही जाना होगा। वर्ना खतरा यह भी है कि जिसे आप कुछ और समझ रहे हैं वह दरअसल कोई और रोग है। पर इससे मेडिकल ब्लॉग का अपना महत्व खत्म नहीं हो जाता। कम से कम यह शिकायत तो खत्म हो ही गई कि हिन्दी ब्लागिंग में सिर्फ साहित्यकारों और पत्रकारों का बोलबाला है।ड्ढr लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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