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कहीं सजा न बन जाए मातृत्व!

मां बनना किसी भी औरत के लिए उसकी पूर्णता का प्रमाण है और यह मातृत्व सुरक्षित हो तो उससे बड़ा सुख और कोई नहीं होता। लेकिन मातृत्व जब खतरे साथ लेकर आए तो औरत के लिए एक भयावह त्रासदी बन जाता है। हकीकत यह है कि तमाम सुविधाओं के बावजूद भारत की लाखों औरतों के लिए मातृत्व अभी भी सुख कम और सजा ज्यादा है। हर साल दुनिया में 78 हाार औरतें प्रजनन तथा गर्भावस्था संबंधी कारणों से बेमौत मरती हैं। इनमें गरीब तबके की महिलाओं की संख्या ज्यादा है। यूनिसेफ के मुताबिक, अकेले भारत में हर रो 20 महिलाएं दम तोड़ती हैं। हर वर्ष करीब 10 लाख शिशु मृत पैदा होते हैं या जन्म लेने के बाद जल्दी ही मर जाते हैं। अधिकांश औरतें रक्तस्रव से मरती हैं। अन्य औरतें ‘अनचाहे’ गर्भ को गिराने-मिटाने और दबाने-छिपाने के मकसद से स्वयं गर्भपात करने की कोशिश में जान से हाथ धो बैठती हैं। औरतें प्रसव पीड़ा की एंठन के कारण मस्तिष्क और गुर्दो के खराब हो जाने के कारण मरती हैं। यहीं पर बस नहीं। और हर साल मरने वाली महिलाओं में 30 से 40 प्रतिशत औरतें प्रसव के दौरान या फिर चौबीस घंटे के अंदर मर जाती हैं। इतना ही नहीं समय रहते महिला का स्वास्थ्य केन्द्र तक न पहुंच पाना और अस्पताल में जरूरी सुविधाएं मुहैया न होना भी इसका एक कारण है। यूनिसेफ के हेल्थ स्पेश्लिस्ट डॉ. पवित्रा का कहना है कि स्वास्थ्य के लिहाज से असुरक्षित परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा बार-बार गर्भधारण करना, गर्भावस्था के दौरान उनकी मौत के खतर को कई गुना बढ़ा देता है। एसी बात नहीं है कि ये असामयिक मौतें रोकी नहीं जा सकतीं। प्रजनन कारणों से होने वाली अधिकांश मौतों तथा बीमारियों को रोका या उनका इलाज किया जा सकता है।ं

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