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दो टूक

विभाग शिक्षा का, फिर भी कॉपीराइट कानून की अहमियत न समझे, बात गले नहीं उतरती। बिना कॉपीराइट 56 लाख की किताबें छपवा लीं। अब एनसीइआरटी ने आपत्ति जतायी, तो कुतर्क दे रहे हैं कि अनुमति के लिए पत्र लिखा था। जवाब नहीं मिला तो मौन सहमति मान ली। यानी, वही लीपापोती वाली सरकारी शब्दावली- ‘प्रत्याशा में!’ अर भाई, दूसर का अधिकार (कॉपी राइट) भी हड़प लेंगे, प्रत्याशा में! लेकिन, मामला उलटा पड़ा। एनसीइआरटी ने झारखंड शिक्षा विभाग की प्रत्याशा को निराशा में बदल दिया। अब, यक्ष सवाल- मान-मनव्वल से एनसीइआरटी न माना, तो 56 लाख की बर्बादी के लिए जिम्मेवार कौन? यह पहली घटना नहीं, 2005 की पुनरावृति है। अफसरों की लापरवाही का खामियाजा हर बार सरकारी खजाने से क्यों! दोषी अफसर के वेतन से वसूला जाना चाहिए!

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