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धर्म और विज्ञान में शनि ग्रह की धारणा में समानताएं

शनि ग्रह का नाम आते ही लोगों में भय हो जाता है। इसके प्रभाव को आज भारत के सभी न्यूज चैनल प्रमुखता से दिखा रहे हैं। प्राचीनकाल से ही शनि ग्रह के बार में विभिन्न विचार रखे गये हैं। हिंदू धर्म में शनि ग्रह के बार में बहुत कुछ लिखा गया है। आइये देखते हैं कि धर्मो में शनि ग्रह का वर्णन और आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान में शनि ग्रह के वर्णन में कितनी समानताएं हैं।ड्ढr शनि सूरज से छठवें स्थान पर है और पूर ब्रह्मांड में वृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह है। कहने को तो वृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है, लेकिन शनि ग्रह के पास सबसे ज्यादा उपग्रह हैं। इसके उपग्रहों की संख्या 50 से भी अधिक है। यानि इस मामले में यह शक्िताली है।ड्ढr धर्म में अपने मंद गति यानि शनै: शनै: चलने के कारण इसका नाम ‘शनैचर’ पड़ा। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि सूर्य से दूर होने के कारण यह सूर्य की परिक्रमा करने में काफी वक्ता लगाता है। इसका परिक्रमा पथ लगभग 14 करोड़ 2लाख किलोमीटर लंबा है और सूर्य की एक परिक्रमा करने में इसे लगभग साढ़े उन्नीस वर्ष लगते हैं।ड्ढr वृहस्पति की तरह शनि भी 75 प्रतिशत हाइड्रोजन और 25 प्रतिशत हिलियम से बना है। धर्म में शनि को सूर्यपुत्र माना गया है। इसका अर्थ है सूर्य से उत्पत्ति। यदि विज्ञान की नजर से देखा जाये तो शनि ही क्यों सभी ग्रहों की उत्पत्ति सूर्य से हुई है। ज्योतिष में शनि को सूर्य का शत्रु माना गया है। शायद इसलिए कि अंतरिक्ष में यह सूर्य से काफी दूर है। शनि को प्रसन्न करने के लिए लोग नीले रंग का पत्थर (नीलम) धारण करते हैं। शनि ग्रह के रंग को यदि देखा जाये तो यह कभी हल्का हरा, पीला या नीला रंग देता है। इसका उत्तरी ध्रुव का रंग काफी नीला है।ड्ढr ज्योतिष विद्या के अनुसार जो लोग शनि के कुप्रभाव में हैं, उन्हें शनि के मंदिर में तेल दान करने की सलाह दी जाती है। तेल की तेजी से बढ़ती किल्लत से जहां पृथ्वीवासी परशान हैं, वहीं शनि के उपग्रह टाइटेन पर तेल की बारिश हो रही है। नासा द्वारा शनि अभियान पर भेजे गये अंतरिक्ष यान ‘कैसीनी’ से मिले जाता आंकड़ों के मुताबिक टाइटेन पर तरल हाइड्रोकार्बन के इतने अकूत भंडार मौजूद हैं कि जितने पृथ्वी पर भी नहीं मिलते। तेल की बारिश के चलते यहां हाइड्रोकार्बन, इथेन और मिथेन के रूप में प्रचुर मात्रा में इकट्ठा हो चुके हैं। तो क्या प्राचीन लोगों को इसके बार में जानकारी थी?ड्ढr शनि से प्रभावित लोगों को अंगुली में लोहे का छल्ला पहनने को कहा जाता है। इसमें भी कुछ समानता दिखती है। शनि ग्रह केचारों ओर कई छल्ले हैं। यह छल्ले बहुत पतले हैं। इसकी मोटाई एक किलोमीटर से भी कम है। इन छल्लों के कण मुख्यत: बर्फ और बर्फ से ढंके पथरीले पदार्थो से बने हैं। शायद इसी संरचना को देखते हुए लोगों को लोहे का छल्ला अंगुली में धारण करने के लिए राय दी गयी। ज्योतिषी ऐसा छल्ला पहनने को कहते हैं, जिसके दोनों छोर आपस में जुड़े न होकर कुछ अलग हों। यदि हम शनि ग्रह के छल्लों को एक तरफ से देखें तो पायेंगे कि वहां पर भी छल्लों के बीच खाली जगह है।ड्ढr शनि ग्रह के बार में एक रोचक जानकारी यह है कि इतने बड़े आकार का होने के बावजूद यह गैसीय ग्रह घनत्व के मामले में पानी से भी कम है। यानि यह काफी हल्का है। इन सार तथ्यों पर यदि हम ध्यान दें तो लगता है कि प्राचीनकाल में लोग भी अंतरिक्ष और शनि ग्रह के बार में अच्छी जानकारी रखते थे।ड्ढr लेखक - भूवैज्ञानिक हैं।ं

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  • Web Title: धर्म और विज्ञान में शनि ग्रह की धारणा में समानताएं