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राह की तलाश

सैद्धांतिक विरोध तथा हाइड एक्ट के कारण वाम दल अमेरिका के साथ प्रस्तावित परमाणु समझौते का पुराोर विरोध कर रहे हैं, किन्तु फ्रांस या रूस के साथ परमाणु करार पर उन्हें एतराज नहीं है। दुनिया के किसी भी देश से ऐसा समझौता करने से पहले अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊरा एजेंसी (आईएईए) तथा परमाणु आपूर्ति संगठन (एनएसजी) की अनुमति आवश्यक है। वाम दलों के साथ आठ दौर की बातचीत के बाद मनमोहन सिंह सरकार ने अमेरिका के साथ समझौते की आशा तो लगभग छोड़ दी है, किन्तु उसकी इच्छा है कि आईएईए तथा एनएसजी से करार हो जाए ताकि दुनिया के अन्य देशों से परमाणु ईंधन व तकनीक मिलने का मार्ग खुल जाए। ताजा वार्ता में वामपंथी पार्टियों ने सरकार की इच्छा पर विचार करने का सकारात्मक संकेत दिया है। 123 समझौते को लेकर कांग्रेस व वामदलों में काफी कड़वाहट है, इसलिए संबंध सामान्य होने में थोड़ा वक्त लगना स्वाभाविक है। आपसी विश्वास की कमी के कारण हां या ना कहने से पहले वाम दल आईएईए से हुई बातचीत का लिखित ब्योरा मांग रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बंदिशों के कारण संप्रग सरकार उन्हें प्रस्तावित समझौते का मसौदा तो नहीं दे सकती, लेकिन उसका सार देने का वायदा कर सदाशयता का परिचय दिया है। आशा है इस माह के अंत में होने वाली संप्रग व वामदलों की बैठक में कोई ठोस परिणाम निकलेगा। वैसे भी वाशिंगटन में बुश प्रशासन पर फिलहाल चुनावों का भूत सवार है, इसलिए आईएईए तथा एनएसजी से अनुमति मिल जाने के बावजूद 123 समझौते पर अमेरिकी संसद की मोहर लगना अब लगभग असंभव है। फिलहाल कुछ गुटनिरपेक्ष देश भी प्रस्तावित समझौते के विरोध में खड़े हो गए हैं। ऐसे में बुश के बाद व्हाइट हाउस में बैठने वाले राष्ट्रपति के लिए 123 समझौते को सिर चढ़ाना आसान नहीं होगा। दुनिया की चिंता छोड़ भारत सरकार को अपने हितों पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई समझौता बराबरी के लेन-देन पर आधारित हो, देश की सुरक्षा व संप्रभुता की गारंटी देता हो और स्वतंत्र विदेश नीति से बंधा हो, तो उसे करने में कोई र्हा नहीं होगा।

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  • Web Title: राह की तलाश