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महिला अधिकार : एक कानून से बदलते हालात

अधिकतर औरतें शादी के बाद ससुराल जाती हैं और यही उनका अपना घर होता है। किन्हीं कारणों से रिश्ता टूट गया तो वह किस घर को अपना समझे यह सवाल बचा रह जाता है। समाज में घर से निकाल देना या निकाल दिये जान की धमकी देना काफी प्रचलित है। इस बुनियादी जरूरत पर अधिकार के सवाल पर और घर से बेदखल करने जैसी हिंसा के मद्देनजर पहली बार घरेलू हिंसा के खिलाफ बन कानून में प्रावधान बनाया गया। 2006 में पारित इस कानून में पति के साथ रहने वाले घर को साझे घर के रूप में परिभाषित किया गया। इसके तहत पत्नी से तनाव होने पर या अलग हो जाने पर उसका आवास अधिकार छीना नहीं जा सकता है। यदि पत्नी इस कानून के तहत पति से कानून की लड़ाई लड़ भी रही हो तब भी वह अपने पति के साथ जिस घर में रहती थी, उस घर स केस लड़ सकती है। दिल्ली के एक कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मॅजिस्ट्रट ने हाल में ही औरत के इस अधिकार का बचाव करते हुए फैसला सुनाया। मॅजिस्ट्रेट ने सोनू भल्ला नाम के व्यक्ित को - जिसने गीता कॉलोनी में अपने मकान को अपने भाइयों के नाम उपहार स्वरूप देन का निर्णय लिया था - उसे निर्देश दिया कि वह ऐसा नहीं कर सकता है। दरअसल सोनू की पत्नी ने घरेलू हिंसा कानून के तहत अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करन के दो दिन बाद ही उसके पति सोनू ने पत्नी को घर से बेदखल करन के उद्देश्य से अपने परिवार के सदस्यों को मकान गिफ्ट कर देन की चाल चली थी। कोर्ट के हस्तक्षेप से उसकी इस चाल पर पानी फिर गया है। कानून से मिले साझे घर का अधिकार व्यावहारिक रूप से इस महिला हो प्राप्त हुआ। इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह फै सला सुनाया कि बिना वैधानिक शादी के साथ रह रहे पार्टनर के खिलाफ हिंसा को घरेलू हिंसा माना जायेगा। पार्टनर पुरुष की दलील थी कि महिला से उसकी विधिवत् शादी नहीं हुई है लिहाजा वह उसके प्रति जिम्मेदार नहीं है। कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। खास बात यह है कि इसके पहल के वे सभी कानून जो महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बने थे वे सिर्फ ससुराल के पक्ष को ध्यान में रखकर बनाए गए थे जब कि यह कानून परिवार की सभी महिलाओं पर लागू होता है। इसलिय कुछ खबरें ऐसी भी आईं थीं कि लड़कियों ने इस कानून का सहारा लेकर अपने माता-पिता द्वारा अपनी मर्जी के खिलाफ जबरदस्ती विवाह करने से खुद को बचाया। जब इस कानून का ड्राफ्ट पेश हुआ तब भी इस पर चर्चा हुई थी कि इसमें विवाहोत्तर सम्बंधों को भी स्वीकृति दी गई है, क्योंकि उन सभी महिलाओं को यह हक दिया गया कि वे अपने पुरुष पार्टनर के खिलाफ इस कानून के तहत शिकायत कर सकती हैं जो बिना शादी के साथ रह रही हैं। अक्सर यह पाया गया था कि ऐसी महिलाओं को उनके उत्तराधिकार के सम्पत्ति के या परिवार के अन्य सभी अधिकारों से आसानी से वंचित कर दिया जाता था जिन्होंने समाज या संविधान स्वीकृत शादी नहीं की थी। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दिए हुए एक और फैसल का उल्लेख करना चाहिए, जो एक मुस्लिम परिवार के बारे में है। कर्नाटक की बिस्मिल्ला बेगम चांद पटेल की दूसरी बीवी थी, जो पहली बीवी की सगी बहन है। शरियत के मुताबिक अपनी बीवी की सगी बहन से तब तक शादी नहीं कर सकते, जब तक पहली के साथ शादी चल रही है। चांद पटेल ने शादी के कुछ साल बाद बिस्सिल्ला बेगम के भरण-पोषण से इंकार कर दिया। कर्नाटक के ज्युडिशियल-मॅजिस्ट्रेट ने बेगम के पक्ष में फैसला देते हुए चांद पटेल को 1000- रुपए प्रतिमाह देन का निर्देश दिया। चांंद पटेल इस निर्देश के खिलाफ सेशंस कोर्ट, फिर हाइकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गया। सभी अदालतों ने फैसल को बरकरार रखा। चांद पटेल की दलील थी कि शरियत के मुताबिक बिस्मिल्ला बेगम उसकी बीवी नहीं है, इसलिए वह उसके प्रति जिम्मेदार नहीं है। जाहिर है कि घरलू हिंसा कानून से कोई बहुत बड़ी क्रांति भले ही न हुई हो, पर इसने उन औरतों को एक सहारा तो दिया है, जिन्हें पहले पितृसत्तात्मक मानसिकता के कानून दर-दर भटकने के लिए मजबूर कर देते थे।ड्ढr लेखिका महिला अधिकार कार्यकर्ता हैंलेखिका महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं

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