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तेल आंकड़े भी अमेरिका के खिलाफ

खाद्यान्न के बाद अब अमेरिका ने पेट्रोल एवं डीाल की खपत के लिए भी भारत और चीन को जिम्मेदार ठहराया है। पर दिलचस्प बात यह है कि दुनिया में पेट्रोल एवं डीाल की होने वाली कुल खपत में भारत का हिस्सा केवल तीन प्रतिशत है जबकि अमेरिका 25 प्रतिशत अर्थात एक चौथाई हिस्से का अकेले उपभोग करता है। चीन में भी केवल नौ प्रतिशत की ही खपत होती है। अगर भारत और चीन के पेट्रो उत्पादों की खपत में तीन या चार प्रतिशत की बढ़ोत्तरी भी होती है तब भी इससे अधिक फर्क नहीं पड़ने वाला जबकि अमेरिका की नकारात्मक वृद्धि भी वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की खपत को बढ़ा देती है। जहांतक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के 122 डालर प्रति बैरल तक पहुंच जाने का सवाल है तो इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के व्यापार में होने वाली सट्टेबाजी जिम्मेदार है। इस सट्टेबाजी की प्रवृत्ति को रोककर ही कच्चे तेल की कीमतों में कमी लाई जा सकती है और इसके लिए अमेरिका को अहम भूमिका निभानी होगी। पेट्रोलियम मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल में हो रही तेज बढ़ोत्तरी को काबू में करने का सबसे कारगर उपाय यह है कि दुनिया भर में जहां भी इसमें फ्यूचर ट्रेडिंग (वायदा कारोबार) होती है , उसपर रोक लगाई जाए। चूंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था इन दिनों मंदी के दौर से गुजर रही है तथा भारत में मुद्रास्फीति का जोर है, इसकी वजह से इन दोनों देशों में पेट्रो उत्पादों की कीमत का बढ़ना इन देशों के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। भारत में पेट्रो उत्पादों का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील है इसलिए सरकार, फिलहाल, इनको छूने का खतरा कभी भी मोलना नहीं चाहेगी। पेट्रोल-डीाल, खासकर, डीाल की कीमतों में इजाफा करने का अर्थ होगा सभी वस्तुओं के दामों में बढ़ोत्तरी और महंगाई के मोर्चे पर कई प्रकार से दबाव झेल रही सरकार एसा करने से बचने की कोशिश करगी।

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