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हाईटेक तरीके से लखपति बनें

सूबे का माहौल बदलते ही कृषि वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि बिहार के किसान एक एकड़ में लीची से दस लाख रुपये कमा सकते हैं। उन्हें बस विपणन के हाईटेक तरीके को अपनाने की जरूरत है। बेंगलुरू स्थित हार्टिकल्चर रिसर्च इन्स्टीटय़ूट के एक वैज्ञानिक ने कहा है कि बिहार की शाही लीची अंग्रेजों को सबसे अधिक पसंद है। यहां की क्वालिटी सवरेत्तम है पर किसान आवश्यक संरचनात्मक सुविधाओं से महरूम हैं। हालांकि, उनके पास नहीं है तो सिर्फ कूल चेन, रफ्रिोरटेड वैन या फिर एयर कार्गो।ड्ढr ड्ढr इन सबके अभाव में देश के सबसे बड़े लीची उत्पादक इस राज्य में कुल उत्पादन की 25 से 30 प्रतिशत लीची बर्बाद हो जा रही है। बंगलुरु के वैज्ञानिक सुधा मैसूर के अनुसार किसानों को प्रति एकड़ दस लाख रुपये प्राप्त करने के लिए अपनी लीची निर्यात करनी होगी। इंग्लैंड सहित कई यूरोपीय देशों में इसकी काफी मांग है। यूरोपियन देशों में लीची या उसका पल्प पानी के जहाज से भेजने का खर्च 5पये प्रति किलो पड़ता है तो हवाई जहाज से भेजने में 142 रुपये प्रति किलो जबकि वहां इसकी बिक्री 500 से 1200 रुपये प्रति किलो होती है। सरकारी अांकड़े के अनुसार देश में लीची के कुल उत्पादन का दो तिहाई भाग बिहार में ही होता है। यहां हर वर्ष चार लाख टन लीची का उत्पादन होता है। जबकि राज्य में मात्र दो प्रतिशत लीची का ही प्रसंस्करण हो पाता है। मुजफ्फरपुर स्थित केन्द्रीय लीची अनुसंधान संस्थान के वरीय वैज्ञानिक राजेश कुमार कहते हैं कि पांच से सात प्रतिशत लीची तो खेतों में ही बर्बाद हो जाती है। यहां बड़े पैमाने पर इसके पल्प की एकमात्र खरीदार सिर्फ डाबर कंपनी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर किसानों को यूरोपियन देशों के अलावा रूस, नीदरलैंड, हंगरी, नेपाल, दुबई और स्पेन जसे देशों में लीची के निर्यात की सुविधा मिल जाये तो वे कई गुणा अधिक कमा सकते हैं।

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  • Web Title: हाईटेक तरीके से लखपति बनें