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4 अप्रैल, 2020|5:19|IST

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राजहठ और न्याय

सरकार का हठ कई तरह से सामने आता है। कभी आदेश बनकर, कभी अध्यादेश और कभी कानून बनकर। मशहूर हृदय रोग सर्जन पी. वेणुगोपाल के मसले पर सरकारी हठ के ये सार रूप एक-एक कर सामने आ चुके हैं। सफाई के तर्क बाद में चाहे जो भी दिए गए हों, लेकिन इसे देश के संवैधानिक इतिहास का पहला ऐसा मौका माना गया था, जब महा एक व्यक्ति को हटाने के लिए संसद में कानून तक पास किया गया। एक समय तो ऐसा लगने लगा था कि वेणुगोपाल को हटाने का काम संप्रग सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस एम्स संशोधन कानून को खारिा कर दिया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि हठ का सिलसिला अब यहीं रुक जाएगा। मसला देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन के समय शुरू हुआ था। तब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास का आरोप था कि एम्स के निदेशक वेणुगोपाल इस आंदोलन को बढ़ावा दे रहे हैं। हालांकि यह भी कहा गया कि यह रामदास और वेणुगोपाल का निजी झगड़ा है, जिसे राजनीतिक व जातिवादी रंग दिया जा रहा है। एम्स के मामले में यह हमेशा ही होता है कि हर स्वास्थ्यमंत्री उसे अपने ढंग से चलाना चाहता है। एम्स एक स्वायत्त संस्था है, इसलिए ऐसी कोशिश में उसके हित वहां के निदेशक से टकराते हैं और ऐसी तनातनी अक्सर दिखाई देती है। एक मंत्री से हम यह उम्मीद करते हैं कि वह देश को नई और कारगर नीतियां देगा। संसाधनों और सुविधाओं में तालमेल के रास्ते तैयार करगा। खासकर स्वास्थ्य के मोर्चे पर जहां इस देश में अभी करने को बहुत कुछ है। तमाम तरक्की के बावजूद लोगों को स्वस्थ जीवन देने के मामले में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में तो घाना जसे देशों से भी बहुत पीछे हैं। पर पिछले काफी समय से देश का स्वास्थ्य मंत्रालय एम्स के निदेशक और फिल्मों के सेंसर में ही उलझा हुआ है। मुमकिन है कि मंत्री और निदेशक में कुछ असहमतियां रही होंगी। लेकिन स्वायत्त संस्थाओं में मंत्रियों के जी हुाूर ही बैठें यह सोच ही एक सिर से गलत है, लोकतांत्रिक तो खर नहीं ही है। हम अगर हर स्वायत्त संस्था से यह उम्मीद करते हैं कि वह सरकार की नीतियों के हिसाब से कामकाज चलाए तो सरकार से यह उम्मीद तो करनी ही चाहिए कि वह संस्थाओं की स्वयत्तता का पूरा सम्मान कर।

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  • Web Title: राजहठ और न्याय