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हुसेन को राहत

विख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसेन बयानवे साल के हैं और अब भी सक्रिय हैं। कुछ कट्टरवादी तत्वों की वजह से वे इस उम्र में भारत से बाहर रह रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में हुसेन के खिलाफ अश्लीलता के मामलों को ‘आधारहीन’ बता कर खारिा कर दिया है, अब यह उम्मीद की जा सकती है कि वे फिर अपने देश आकर चैन से रह सकेंगे। हुसेन भारत के सर्वाधिक चर्चित चित्रकार हैं जिनके चित्रों में भारत का हर रंग और रूप दिखता है। हुसेन के चित्रों में एक ऐसी गहरी भारतीयता है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता, लोक और शास्त्र, लोकप्रिय और अभिजात, सबका मेल है, इसलिए जब तक कुछ कट्टरवादी हिन्दुओं ने हुसेन के चित्रों को ‘अश्लील’ ‘हिन्दूविरोधी’ नहीं करार दिया, तब तक हुसेन की धार्मिक पहचान का किसी को ख्याल तक न आया था। सहा धर्मनिरपेक्ष मुद्दों को सांप्रदायिक बना देना हर किस्म की धार्मिक कट्टरता की विशेषता होती है और हुसेन भी इसी कट्टरता के शिकार बनते रहे हैं। ऐसे कई चित्र जो हुसेन ने चालीस-पैंतालिस साल पहले बनाए थे, वे धार्मिक उन्माद के निशाने पर आ गए। यह अच्छा है कि अदालत ने अपने फैसले में इस उन्माद और कट्टरता के आधारहीन होने को रखांकित किया। इंटरनेट और पर्चो के जरिए जिस तरह का अभियान चलाया गया है, उसका मूल मंतव्य यह है कि सारी दुनिया में एक हिन्दूविरोधी षड्यंत्र चल रहा है और हुसेन उस षड्यंत्र के एक अंग हैं। इस तरह का काल्पनिक खतरा पैदा कर असुरक्षा और संकीर्णता की भावना पैदा करने वाले ज्यादा लोगों को प्रभावित नहीं कर पाते। लेकिन अपने आक्रामक और हिंसक तौर-तरीकों से समाज में उदारता के मूल्यों को आघात पहुंचाते हैं और इस तरह समाज के ज्यादा उदार और लोकतांत्रिक विकास में बाधा जरूर पहुँचाते हैं। एक हुसेन या एक तसलीमा नसरीन की अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता सिर्फ किसी एक व्यक्ित का मामला नहीं होता, वह समूचे समाज के प्रगतिशील रास्ते की रुकावट होता है। हम संतोष कर सकते हैं कि जहाँ लोकतंत्र के दूसर संस्थान चूक गए, वहाँ एक संस्थान, न्यायपालिका ने लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा की है।ं

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