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खाद्य संकट- वक्त है साथ चलने का

अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश का यह कहना कि विश्व खाद्य संकट के लिए भारत जिम्मेदार है, न तो जायज ही लगता है और न ही सही भी है। अमेरिका ही नहीं विकसित देशों के लोगों का औसत उपभोग भारत के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। हमारी 25 करोड़ आबादी गरीबी की रखा से नीचे है और 75 फीसदी आबादी ऐसी है जिसे हर रो 20 रुपए से कम पर अपना गुजारा चलाना पड़ता है। अगर हम खाने की गुणवत्ता, प्रोटीन और पोषण तत्वों के लिहाज से देखें तो हालत और भी खराब दिखेगी। अमेरिका में जिस तरह से भोजन बर्बाद किया जाता है, वह अविश्वसनीय है। वैसे यह भारत में भी होता है, लेकिन यहां इसका कारण या तो गरीबी है, या भंडार की सही व्यवस्था न होना, या फिर उसे समय रहते बाजार न ोज पाना है। मुमकिन है कि राष्ट्रपति बुश भारत की अभूतपूर्व तरक्की की बात कर रहे होंगे, जिससे लोगों की आमदनी बढ़ी है और भोजन की मांग भी। तो क्या उनका आशय यह था कि इस तरक्की का एक खराब पहलू भी है और कामयाबी के साथ ही असफलता भी जुड़ी होती है? कुछ देशों में भोजन को लेकर जो दंगे हुए हैं, उनसे खाद्य सुरक्षा के मसले की गंभीरता का अंदाज तो मिल ही गया है। ज्यादातर देशों ने मांग और आपूर्ति से निपटने के लिए तात्कालिक कदम भी उठाए हैं। मांग को कम करने के लिए बाजार से मुद्रा की तरलता को कम करना एक तरीका है, लेकिन यह गरीबों को सबसे ज्यादा परशान करता है जो किसी भी तरह से अपने उपभोग की प्राथमिकताएं बदलने की हालत में नहीं होता। दूसरी तरफ अगर हम नियम-कायदों में सुधार कर दें और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को ठीक से लागू करं तो तत्काल फायदा पहुंच सकता है। लेकिन दीर्घकाल के हिसाब से हमें कृषि उत्पादन की उन बाधाओं को ही खत्म करना होगा जो बढ़ती मांग को पूरा करने में चूक जाती हैं। मैड्रिड में एशियन डेवलपमेंट की बैठक में और उसके पहले विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बैठक में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने खाद्यान्न के बदले बॉयोफ्यूल की फसल बोने को दोषी करार दिया। इस बात को कई जगह पहले भी कहा गया है लेकिन यह सिर्फ समस्या का एक पहलू भर ही है। इसकी वजह से खाद्यान्न संकट किस हद तक है, इसे लेकर तरह-तरह के अनुमान हैं। इसके बजाय आस्ट्रेलिया के सूखे और ग्लोबल वार्मिग को ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है। गरीब देशों के लोगों की आमदनी बढ़ने से वहां अनाज की मांग बढ़ रही है और वहां के लोग ज्यादा गुणवत्ता वाले भोजन पसंद करने लगे हैं। मीट का उपभोग बढ़ने से पशुओं के चार की खेती भी बढ़ी है। इन सबका गंभीरता से अध्ययन करने की जरूरत है। एशियन डेवलपमेंट बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के बोर्ड ऑफ गर्वनर ने अपनी विज्ञप्ति में खाद्य सुरक्षा का चलताऊ किस्म से जिक्र भर है। इसमें कहा गया है कि कई विकासशील देशों में खाद्यान्न और ऊरा के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसका गरीब लोगों पर खास असर पड़ रहा है। मुद्रा कोष ने ऐसे देशों की मदद की योजनाएं भी बनाई हैं। मुद्रा कोष की प्रेस ब्रीफिंग में भी कहा गया कि निर्यातक देशों को भले ही इस स्थिति से कुछ फायदा हुआ हो, लेकिन एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरीबियन के गरीब देशों को खासी परशानी हो रही है। डेवलपमेंट बैंक और विश्व बैंक के अध्यक्षों ने भूखे लोगों की शीघ्र मदद के लिए यूएन विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत 5000 डालर का एक आपात फंड बनाने की भी बात की। यह भी पाया गया कि अगर तुरंत कार्रवाई न की गई तो दस करोड़ गरीब संकट में आ जाएंगे। जाहिर है कि ऐसे संकट के साथ पूर सामंजस्य से ही मुकाबला हो सकेगा। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। पहली जरूरत तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां आपस में तालमेल बनाएं। एशियन डेवलमेंट बैंक, वर्ल्ड बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व खाद्य संगठन, विश्व व्यापार संगठन, यूएन वर्ल्ड फूड प्रोग्राम और क्षेत्रीय विकास बैंक सभी को एकसाथ मिलजुलकर काम करना होगा। किस को जरूरत है और कौन जिम्मेदार है, इसे अलग-अलग रखना होगा। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों में जिम्मेदारियां एक दूसर से उलझती रहती हैं, इसलिए तालमेल वहां सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए। दूसरी जरूरत यह है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश किल्लत के समय सही व्यवस्था से एक दूसर से कदम मिलाकर चलें। अक्सर कुछ देशों के अपने कदमों के चलते दुनिया को चीजों की किल्लत महसूस होने लगती है और फिर यह बेमतलब चक्र बेवजह चलता रहता है। इन कदमों में घरलू नीति के मुद्दे, राजस्व नीति, निर्यात नीति और गैर राजस्व बाधाएं आदि शामिल हैं। इसके लिए एक ऐसी एजेंसी तैयार करनी होगी जो जरूरत पड़ने पर उत्पादक देशों और उपभोग वाले देशों के बीच पूरी जिम्मेदारी से वार्ता चलाए और दोनों ही देशों का लाभ पहुंचाने की स्थिति पैदा करे।ड्ढr तीसरी जरूरत आपूर्ति की स्थिति सुधारने की है। इसमें तात्कालिक और दीर्घकालिक कई तरह के कदम उठाने होंगे। इनसे कई तरह के मुद्दे भी जुड़े हैं। इसमें भंडारण की क्षमताओं को सुधारना, खाद्य पदार्थो की आयु को बढ़ाना, बरबादी रोकना, फसलों का बहुलीकरण करना, डेयरी, मछली और पशुपालन उद्योग पर जोर देना आदि भी शामिल हैं।ड्ढr चौथी जरूरत यह है कि हमें ऐसी नीतियां भी अपनानी होंगी जिससे पूरी दुनिया का संतुलन न बिगड़ जाए। खाद्यान्न की खेती की जगह बॉयो फ्यूल की खेती करने का फैसला विशेषज्ञों को पूर अध्ययन के बाद होना चाहिए था। इससे फॉसिल फ्यूल का विकल्प तो मिल रहा था, लेकिन इससे कितना बड़ा खाद्य संकट खड़ा होगा यह पहले नहीं सोचा गया। इसके लिए एक -दूसर के विपरीत जाने वाले वैज्ञानिक आंकड़ों का मिलान जरूरी था। साथ ही तकनीकी विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए था। वैकल्पिक ईंधन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन इसके लिए उन सभी देशों को तालमेल बनाकर चलना होगा, जिनके लक्ष्य एक-दूसर के विपरीत हैं। खाद्य सुरक्षा एक बड़ा ही गंभीर मसला है। इसके लिए बहुपक्षीय फ्रेमवर्क जरूरी है। साथ ही जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र परिवार के सार सदस्य मिलजुलकर काम करं। खाली समर्थन और सांत्वना से काम नहीं चलने वाला। लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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