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विदेश नीति : संधि की टूटती कड़ियां

इस तर्क से असहमति नहीं हो सकती कि अगर कोई संधि बदली भू-राजनैतिक परिस्थितियों को अभिव्यक्त नहीं करती तो उसे बदला जाना चाहिए। इस संधि की शब्दावलियां तब गढ़ी गईं जब भारत नया-नया औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुआ था और इसका नेतृत्व ऐसे नेताओं के हाथों था जो समानता पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना के पक्ष में थे। इन आदर्शो के प्रति उनकी निष्ठा पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं कर सकता। यह मानना मुश्किल है कि ऐसे नेता अपने पड़ोसी, जिसके साथ कोई अन्यापूर्ण संधि कर भी सकते हैं। फिर 10 की संधि कोई पहली संधि नहीं थी। नेपाल के राजा ने अंग्रेजों से भी 1में एक मित्रता संधि की थी। इसमें पहली बार अंग्रेजों ने नेपाल को संप्रभु देश स्वीकार किया था। यह प्रथम विश्वयुद्व में नेपाली गुरखा सैनिकों का योगदान का नतीजा था। इसमें करीब 20 हजार गोरखा मारे गए थे और इसके लिए अंग्रेजों ने पहले एक लाख तथा बाद में दो लाख रुपया सालाना नेपाल को देना आरंभ किया था। इस संधि की भाषा देखें तो इसमें समानता का भाव कहीं नहीं दिखता। भारत ने 10 की शांति और मित्रता की संधि में पहले हुई सभी संधियों को सिरे से खारिज कर दिया। यह संधि दोनों देशों के राजनीतिक एवं आर्थिक संबंधों का मूलाधार है। माओवादी इसकी जो व्याख्या करें पर 58 वर्ष पहले यह दुनिया के लिए इस बात की मिसाल थी कि तुरत आजाद हुआ एक देश अपने पड़ोसी को औपचारिक तौर पर कितना अपनापन और सम्मान दे सकता है। संधि राणा काल में हुई थी। पर लागू हुई1में लोकतंत्र की स्थापना के बाद। इसमें दोनों देशों के लोगों को राजनीति के अलावा बसने से लेकर, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, नौकरी, शादी-विवाह आदि वे सभी अधिकार दिए गए हैं जा केवल अपने नागरिकों को मिलते हैं। संधि द्विपक्षीय थी, पर इसमें लाभ का पहलू नेपालियों की ओर झुका था। इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि अंग्रेजों ने नेपाली शासन का भारत की आजादी की लड़ाई में जैसा उपयोग किया था, उसकी कटु यादों के रहते हुए ऐसा किया गया। यह एक समानता की संधि थी, जिसमें दोनों बाहरी आक्रामण से एक दूसरे की सुरक्षा पर खतरे को सहन नहीं करने तथा दोनों सरकारों के बीच मित्रतापूर्ण संबंधों को तोड़ने वाली या गलतफहमी पैदा करने वाले पड़ोसी देशों की किसी भी प्रकार की गतिविधि की सूचना देन के प्रति वचनबद्व हैं। सेना को प्रशिक्षण से लेकर विकास एवं सुरक्षा व्यय की जिम्मेवारी भारत ने ली, जिसे निभाया जा रहा है। अहसान नहीं जिम्मेदारी समझकर ऐसा किया गया। संधि के बाद कुछ मुद्दों पर बातचीत हुई एवं कुछ बिन्दु जोड़े गए। इनमें एक यह था कि अगर नेपाल अपने प्राकृतिक संसाधनों के विकास या किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान के लिए विदेशी सहायता चाहता है तो वह भारत सरकार या भारतीय को प्राथमिकता देगा, लकिन ऐसा तभी होगा, जब भारत या भारतीय द्वारा ऑफर की गई शर्ते विदेशी शर्तो से नेपाल के लिए कम लाभदायक नहीं होंगी। इस बिंदु की आप किसी तरह व्याख्या कर सकते हैं। इसी प्रकार नेपाल सरकार यदि अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे देशों से शस्त्रास्त्र आदि भारत के रास्ते मंगाना चाहे तो ऐसा वह भारत की सहमति और उसके सहयोग से ही कर सकती है। माओवादियों की आपत्ति में नया कुछ नहीं है। 1में नेपाल के कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी ने भारत यात्रा के दौरान इस संधि के पुनरीक्षण की मांग की थी। यह बात ठीक है कि 10 के बाद बहुदलीय राजनीतिक सक्रियता के कारण नेपाल का अांतरिक मनोविज्ञान काफी बदला है। भूमंडलीकरण से भी माहौल में परिवर्तन आया है। लकिन इन दोनों कारकों के नकारात्मक पहलू नेपाल में ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुके हैं। मसलन, आपसी प्रतिस्पर्धा में राजनीतिक दलों और नेताओं ने भारत विरोधी भावनाएं भड॥काईं हैं। नेपाल में यह आम कहावत है कि आपको लोकप्रिय होना है तो भारत के खिलाफ आग उगलिए। संधि के खिलाफ वायुमंडल इसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से बना है। शुरू में नेपाल का ही आग्रह था कि भारत के उद्योगपति, व्यापारी, तकनीशियन, इंजीनियर आदि इसके विकास में योगदान दें और संधि के बाद ऐसा हुआ, इसलिए आज संधि को खलनायक बनाना उचित नहीं है। संधि में नेपाल को एक वर्ष का नोटिस देकर अलग होन का अधिकार है। वह चाहे तो ऐसा कर सकता है। संप्रभु देश के नाते नेपाल भारत के साथ किस प्रकार का संबंध रखना चाहता है इसका निर्धारण उस करना है।ड्ढr लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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